मुरली तेरा मुरलीधर 24
भूत मात्र में व्याप्त ईश का सूत्र न छोड़ कभीं मधुकर कर्म त्याग संभव न त्याग भी तो है एक कर्म निर्झर रज्जु सर्प ताड़न…
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भूत मात्र में व्याप्त ईश का सूत्र न छोड़ कभीं मधुकर कर्म त्याग संभव न त्याग भी तो है एक कर्म निर्झर रज्जु सर्प ताड़न…
मुख मन अन्तर श्वाँस श्वाँस सब सच्चामय कर दे मधुकर सच्चा प्रेम सार जग में कुछ और न सार कहीं निर्झर जागृति स्वप्न शयन में…
दुख का मुकुट पहन कर तेरे सम्मुख सुख आता मधुकर सुख का स्वागत करता तो दुख का भी स्वागत कर निर्झर सुख न रहा तो…
स्वाद सुधा में है पदार्थ में स्वाद न पायेगा मधुकर सुख तो सब उसे सच्चे प्रिय में कहाँ खोजता रस निर्झर मन गृह में जम…
इन्द्रिय घट में भक्ति रसायन भर भर चखता रह मधुकर तन्मय चिन्तन सच्चा रस में देता तुम्हें बोर निर्झर कर त्रिकाल उस महाकाल के चरणामृत…
अहं रहित मह मह महकेंगे तेरे प्राण सुमन मधुकर स्निग्ध चाँदनी नहला देगी चूमेगा मारुत निर्झर तुम्हें अंक में ले हृदयेश्वर हलरायेगा मधुर मधुर टेर…
अपनी ही विरचित कारा में बंधा तड़पता तू मधुकर nअपनी ही वासना लहर से पंकिल किया प्राण निर्झर nउस प्रिय की कर पीड़ा हरणी चरण…
वह कितनी सौभाग्यवती है अभिरामा वामा मधुकर nकुलानन्दिनी कीर्तिसुता की अंश स्वरुपा वह निर्झर nउसकी पद नख द्युति से कर ले अपना अंतर तिमिर हरण…
भर जाते नख शिख पावस घन विकल बरसने को मधुकर n जितनी प्यासी भू उतने ही प्यासे हैं नीरद निर्झर तूँ जितना व्याकुल उतना ही…