विनय की कविता (ऑडियो)
nपाँच-छः वर्ष पहले हमारे कस्बे में हुए एक कवि-सम्मेलन, जो आकाशवाणी वाराणसी के तत्कालीन निदेशक श्री शिवमंगल सिंह ’मानव” की पुस्तक के विमोचन पर आयोजित…
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nपाँच-छः वर्ष पहले हमारे कस्बे में हुए एक कवि-सम्मेलन, जो आकाशवाणी वाराणसी के तत्कालीन निदेशक श्री शिवमंगल सिंह ’मानव” की पुस्तक के विमोचन पर आयोजित…
वह अनकहे स्नेह चितवन से उर में धँस जाता मधुकर इस जीवन के महाकाव्य की सबसे सरस पंक्ति निर्झर जन अंतर के रीते घट में…
कोटि काम सुन्दर गुण मन्दिर कोटि कला नायक मधुकरअपने हृदयेश्वर के आगे थिरक थिरक नाचो निर्झरउर वृन्दावन चारी को मन दे उनके मन वाला बनटेर…
बस अपने ही लिये रचा है तुमको प्रियतम ने मधुकरअन्य रचित उसकी चीजों पर क्यों मोहित होता निर्झरश्वांस श्वांस में बसा तुम्हारे रख अपना विश्वास…
नहीं भागते हुए जलद के संग भागता नभ मधुकरचलते तन के संग न चलता कभीं मनस्वी मन निर्झरकिससे क्या लेना देना तेरा तो सच्चा से…
अगणित जन्मों की ले दारुण कर्मश्रृंखलायें मधुकरजब जो भी दीखता उसी से व्याकुल पूछ रहा निर्झरउसका कौन पता बतलाये नाम रुप गति अकथ कथाटेर रहा…
आह्लादित अंतर वसुंधरा दृग मोती ले ले मधुकरभावतंतु में गूंथ हृदय की मधुर सुमन माला निर्झरपिन्हा ग्रीव में आत्मसमर्पण कर होती कृतार्थ धरणीटेर रहा सर्वस्वस्वीकृता…
किससे मिलनातुर निशि वासर व्याकुल दौड़ रहा मधुकर सच्चे प्रभु के लिये न तड़पा बहा न नयनों से निर्झर व्यर्थ बहुत भटका उनके हित अब…
संश्लेशित जीवन मधुवन को खंड खंड मत कर मधुकर मधुप दृष्टि ही सृष्टि तुम्हारी वह मरुभूमि वही निर्झर तुम्हें निहार रहा स्नेहिल दृग सर्व सर्वगत…