Phone : +91 5412 246 707

Archive: 2008

बावरिया बरसाने वाली 16

सुधि करो अंक ले मुझे कहा था अभीं अभीं चंदा निकला है कैसे कहती ढल गयी निशा लाई है उषा वियोग- बाला है । बोलते कहाँ है अरुणचूड़ किस खग को उड़ते...

Read More

बावरिया बरसाने वाली 15

प्रिय ! इस विस्मित नयना को कब आ बाँहों में कस जाओगे । अपना पीताम्बर उढ़ा प्राण ! मेरे दृग में बस जाओगे । प्रिय! तंडुल-पिंड-तिला वेष्टित...

Read More

बावरिया बरसाने वाली 13

परिमल-सम्पुट पिक-स्वर-गुंजित उन्मन मीठे तीसरे पहर । जाने किस अनुकम्पा में प्रिय ! झुक गए ललक मम चरणों पर । नटखटपन में जहर गयी प्राण!कुंतल मे...

Read More

बावरिया बरसाने वाली १२

अगणित मधु प्रणय-केलि-क्षणिकाएं मानस पट पर लहरातीं । सुधि आती प्रिय क्या रही दशा जब तुमने भेजा था पाती । कम्पित अँगुली दृग पट बोझिल पुलकित वप...

Read More

बावरिया बरसाने वाली10

सुधि करो कुञ्ज से उमड़-घुमड़ देखती स्निग्ध श्यामल जलधर । पार्श्वस्थ स्वामी चुम्बिता अवनि पर बिखराती उरोज अम्बर । प्राणेश पाणिश्रृत ईषत च...

Read More

बावरिया बरसाने वाली 10

पूछा था " क्यों अन्तक करस्थ सायक सहलाता मृगछौना ? क्यों नभ चुम्बन हित ललक लहराता भूतलस्थ पादप बौना ? लौटेंगे प्रिय न प्रतीति विपुल बीती...

Read More

बावरिया बरसाने वाली 9

सुधि करो कहा "क्यों स्नेह-सलिल संकुल तेरे कुवलय लोचन । क्यों गाढ़ प्रणय-परिरम्भण में होता वपु-प्रसरण-संकोचन । कोमल कुंतल के असित अंक मे...

Read More

बावरिया बरसाने वाली 8

सुधि करो प्राण पूछा तुमने " वह पीर प्रिये क्या होती है । जिसकी असीम वेदना विकल हो निशा निरंतर रोती है। आया न अभी ऋतुराज तभीं होती उ...

Read More

बावरिया बरसाने वाली 7

सुधि करो प्राण पूछा तुमने "क्यों मौन खड़ी ब्रजबाला हो? स्मित मधुर हास्य की मृदुल रश्मि से करती व्योम उजाला हो । तुम वारी-वीचि की सरस...

Read More

बावरिया बरसाने वाली6

था कहा "धूसरित ग्रीष्म गगन या सरस बरसता पावस हो। चांदनी चैत की हो डहकी या हेमंतिनी अमावस हो । प्रति दिवस जलज जयमाल लिए मैं सुमुखि करूंग...

Read More

बावरिया बरसाने वाली2

थे नाप रहे नभ ओर-छोर चढ़ धारधार पर धाराधर । दामिनी दमक जाती क्षण-क्षण श्यामलीघटाओं से सत्वर । कल-कल छल-छल जलरव मुखरित था यमुना-पुलिन मनो...

Read More

बावरिया बरसाने वाली

व्रजमंडल नभ में उमड़-घुमड़ घिर आए आषाढ़ी बादल । उग गया पुरंदर धनुष ध्वनित उड़ चले विहंगम दल के दल । उन्मत्त मयूरी उठी थिरक श्यामली निरख नीरद म...

Read More

Amazed And Thinking! Have some questions?

Contact Form

Name

Email *

Message *