15 December 2008

बावरिया बरसाने वाली 16

सुधि करो अंक ले मुझे कहा था अभीं अभीं चंदा निकला है
कैसे कहती ढल गयी निशा लाई है उषा वियोग- बाला है ।
बोलते कहाँ है अरुणचूड़ किस खग को उड़ते देखा है ।
अन्तर में अभीं समानांतर सप्तर्षि गणों की रेखा है ।
निकटस्थ सरित का सेतु लाँघ काफिला नहीं कोई निकला ।
अरुणिमा क्षितिज में कहाँ तुम्हें क्या दीख पड़ीं कोई चपला ।
सुनाती प्रभात की बात न अब बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३४॥


था कहा "शुक्र झांकता न मलिना उडुगण की चटकारी है ।
क्या राम- राम कह रहा कहीं देवालय बीच पुजारी है ?
है अभी पूर्ण निस्तब्ध यामिनी वायस के स्वर शांत पड़े ।
है कहाँ धेनु-दोहन-शिशु-नर्तन मौन सभी जलजात खड़े ?
मलयानिल झुरक-झुरक सहलाता कहाँ तुम्हारा मृदु आनन्?
है कहाँ भानु को चढ़ा रहे जल वाटू-तपस्वि-गण देख गगन ?
वह स्थिति न भुलाए भूल रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३५॥

05 December 2008

बावरिया बरसाने वाली 15

प्रिय ! इस विस्मित नयना को कब आ बाँहों में कस जाओगे ।
अपना पीताम्बर उढ़ा प्राण ! मेरे दृग में बस जाओगे ।
प्रिय! तंडुल-पिंड-तिला वेष्टित सी गाढ़ालिंगन समुहाई ।
युग गए काय यह जल पय-सी तव तन में नहीं समा पायी ।
हो जहाँ बसे क्या वहाँ प्राण ! कोकिला कभीं बोलती नहीं ।
जल गया मदन-तन क्या मंथर, मलयज बयार डोलती नहीं ।
सह सकती कैसे विषम बाण बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्रान निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३२॥
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मम-अधर दबा करते थे सी-सी ध्वनित सम्पुटक चुम्बन जब ।
पृथु उरु उरोज का बढ़ जाता था वसन विहीन विकम्पन तब ।
प्रिय! तेरे स्मित कपोल चिबुकाधर कुंद दशन से डंसती थी ।
मैं हार हार कर भी चुम्बन की द्युत क्रिया में फंसती थी ।
पूछा था मैं तो नित अतृप्त क्या तुम भी प्रिये ! तरसती हो ?
निद्रित पलकों में भी आ आ क्यों चपल बालिके बसती हो ?
यह मदन-विनोद-विछोह-विकल बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन की वनमाली ॥ ३३॥

29 November 2008

बावरिया बरसाने वाली १४

कैसे कहकर थे फूट पड़े छोडो अकेला मुझे प्रिये
इस प्रेम भिक्षु को ठुकरा कर मत दूर करो प्रस्थान प्रिये
नव-नव भंगिनी प्रणय-मुद्राओं से करो सूनी रजनी
थिरकते गीत की विविध राग-रागिनी रचोगी कब सजनी।
दर्पण में बिंबित विविध रमन-मुद्राएँ घटित करो रानी
पद-पूर्ति समस्यायें बूझेगा कौन पहेली की वाणी?
जा लीला-सर्जक ! विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥ ३०॥
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सुधि करो प्राण कहते थे तुम क्यों बात-बात में हंसती हो
किस कलुषित कंचन को मेरे निज हास्य-निकष पर कसती हो
तुम होड़ लगा प्रिया उपवन की सुरभित कलियाँ चुन लेते थे
सखियों से होती मदन-रहस-बातें चुपके सुन लेते थे
सहलाते थे मृदु करतल से रख उर पर मेरे मृदुल चरण
प्रिय-पाणि-पार्श्व से झुका स्कंध रख देते आनन पर आनन
धंस डूब मरे हा ! जाय कहाँ बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥ ३१॥

21 November 2008

बावरिया बरसाने वाली 13

परिमल-सम्पुट पिक-स्वर-गुंजित उन्मन मीठे तीसरे पहर ।
जाने किस अनुकम्पा में प्रिय ! झुक गए ललक मम चरणों पर ।
नटखटपन में जहर गयी प्राण!कुंतल में गूंथी सुमन-लड़ी ।
तेरी ग्रीवा पर रख दुकूल थी निकट सिमटती मौन खड़ी ।
चौमासे की उफनती सरित सी नील साटिका फहराती ।
झीनाम्बर से झलकती गुराई लोचन-भाषा सिखलाती ।
डूबी प्रिय लीला सिन्धु बीच बावरिया बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥ २८॥
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मम उरज प्रान्त पर शांत बाल सा रख कपोल थे किए शयन ।
सहलाती मसृण पाणि कुंतल अर्धोन्मीलित जलजाभ नयन ।
कहती थी "प्राण! काल कवलित हो जे न प्रणय मिलन घातें।
निस्पंद शून्य में खो न जाँय ये रस-रभस-कातर रातें ।
वर्जन की वे अंगुलियाँ आज भी मेरे अधर दबा जातीं ।
वह छवि न भूलती धरे चिबुक नभ-ध्रुव-अरुंधती दिखलाती।
लीला सहचर ! सुधि लो विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥२९॥

17 November 2008

बावरिया बरसाने वाली १२

अगणित मधु प्रणय-केलि-क्षणिकाएं मानस पट पर लहरातीं ।
सुधि आती प्रिय क्या रही दशा जब तुमने भेजा था पाती ।
कम्पित अँगुली दृग पट बोझिल पुलकित वपु दक्षिण नयन-स्फुरण ।
उच्छ्वास उष्ण दोलित दुकूल अति अरुणिम अधर जघन कम्पन ।
उर्जस्वित अंगड़ाईयाँ अमित ज्यों फेनिल सरिता बरसाती ।
निस्पंद कीर पिंजर-पालित निष्कंप दीप लौ मुस्काती ।
वह पाती छाती दबा विकल बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥२६॥
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तेरे लालित विहंग मुझको दुलरा करते पवानारोहण ।
उमड़ता रभस रस-मिलन-घात का दर्दीला निशि-सम्मोहन ।
प्रति उषा-निशा में कुछ कपोल पर छलकी अश्रु-सलिल गगरी।
अभिसार-शून्य प्राणेश्वर-विरहित अंत विहीना विभावरी ।
गलबहियों के आकुल आमंत्रण में नागिन सी डंस जाती।
कुहरिल प्रदोष की विजन तारिका झिलमिल मिलन-गीत गाती।
निर्मोही! अब भी आ विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥ २७॥

15 November 2008

बावरिया बरसाने वाली 11

सुधि करो प्राण ! था कहा कभीं "चिर अमर वल्लभे वे मधुक्षण ।

रोमांच कंटकित मृदु बाँहों के शत-शत ममतामय बंधन ।"

प्रिय-पाणि-संस्थिता कल-कल निरता तटिनी-तीर नीर-सीकर ।

निश्चल निहारते दीपशिखा सी अस्ताचलगामी दिनकर।

मम भरी नर्म-कांपती हथेली थाम अधर पर धरे अधर।

लज्जानत विनत वदन दशनों से दाब तर्जनी गयी सिहर।

उन्मुक्त कुंतला वही विकल बावरिया बरसाने वाली-

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली॥२४॥

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कर्णावलम्बि कम्पित कुंडल स्वेदाम्बु-सिक्त मनसिज-मथिता.

लिपटती लता-सी सीत्कृत वलयित स्कंधारोहण अभिलषिता ।

तुम कोटि-काम-चेष्टा-चंचल द्रुत कुञ्ज-तिमिर में गए समा।

बाँहों में केसरिया दुकूल का शेष रह गया कोर थमा।

श्लथ-कुंतल-कुसुम-सुरभि-मूर्छित मन के हो गए विमुग्ध हिरन ।

क्या याद न उडुगन-खचित निशा के लिए दिए अगणित चुम्बन ?

आ जा कृपणा के धन ! विकला बावरिया बरसाने वाली-

क्या प्राण निकालने पर आओगे जीवनवन के वनमाली॥२५॥

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14 November 2008

बावरिया बरसाने वाली10

सुधि करो कुञ्ज से उमड़-घुमड़ देखती स्निग्ध श्यामल जलधर ।

पार्श्वस्थ स्वामी चुम्बिता अवनि पर बिखराती उरोज अम्बर ।

प्राणेश पाणिश्रृत ईषत चुम्बित छुई-मुई सी कभीं-कभीं।

जब प्रिया-प्रयाण-क्षण में कहती "प्राणेश! शेष है निशा अभीं ।"

अगणित वर्जन पर भी जब कुंतल लहरा देता मलय पवन ।

द्रुत चरण क्षेप से कर उठते तत्-थेई-थेई-थेई नूपुर नर्तन ।

उस स्मृति में हे प्रिय ! बही विकल बावरिया बरसाने वाली -

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥ २२ ॥

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सुधि करो प्राण ! गोविन्द-गीत'पंकिल' स्वर करती थी गायन ।

पूछती "प्राण! फ़िर कब लौटेंगे ये आषाढी पावस-घन?

क्यों जलद-हंस-कोकिल-शुक बनते प्रेमपुरी के पटु धावन ?

क्यों तेरी अप्रतिम छवि निहार उमड़ता विलोचन में सावन ?"

था कहा "निलय से झाँक रहे प्रियतमे! विहंगम से पूछो ।

चुम्बन जड़ देता क्यों प्रिय निज आनन चन्द्रोपम से पूछो ।"

अब क्या न बतकही-योग्य रही बावरिया बरसाने वाली-

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥ २३॥

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11 November 2008

बावरिया बरसाने वाली 10

पूछा था " क्यों अन्तक करस्थ सायक सहलाता मृगछौना ?
क्यों नभ चुम्बन हित ललक लहराता भूतलस्थ पादप बौना ?
लौटेंगे प्रिय न प्रतीति विपुल बीतीं बसंत की मधु राका ।
फिर भी विराहज स्पंदन न स्तब्ध क्यों प्रोषित पतिका प्रमदा का ?
क्यों सलिल राशिः भैरव निनाद लोटता अवनि पर धुन माथा ?
पावस घन चपला लिए अंक में धावित यह कैसी गाथा ?
बस लिपट गयी कुछ कह न सकी बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥ २०॥
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पूछा तुमने अति पास बैठ " अब भी न जान पाया आली ।
क्यों तव प्रसून-वपु छवि सँवार थकता न कभीं भी वनमाली ।
किस महाकाव्य की सरस पंक्ति हो किस स्वर की मूर्छना कला।
किस कविता की आनंद-उर्मि किस दृग की सलिल विन्दु विमला ।
क्यों थम चीर तेरा समीर गाता विहाग दे दे ताली
परिरंभ विचुम्बित अधरामृत की क्यों न रिक्त होती प्याली ?"
बोली न, विमुग्ध रही सुनती बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥२१॥

06 November 2008

बावरिया बरसाने वाली 9

सुधि करो कहा "क्यों स्नेह-सलिल संकुल तेरे कुवलय लोचन ।
क्यों गाढ़ प्रणय-परिरम्भण में होता वपु-प्रसरण-संकोचन ।
कोमल कुंतल के असित अंक में गूंथे तुमने विविध सुमन ।
उमड़ता रहा रसमय परिरम्भित उरज-संपुटित हृद-स्पंदन। "
जुड़ गए परस्पर अनायास हे प्रियतम ! अरुण अधर पल्लव।
प्राणेश हुए मेरे तन के रोमांचित सिंदूरी अवयव ।
उस क्षण की भिखमंगिनी बनी बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥१८॥
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पूछा "क्यों उर्मिल उदधि चंद्रकर झूम झूम चूमता सदा ?
निज अंतरालगत सलिल सम्पदा दिनमणि को बांटता मुदा ?
किस विकल वेदना में चकोर चुगता पावक का अंगारा ?
क्यों सोम-सूर्य करते फेरी अपलक निहारता ध्रुव तारा ?
क्यों नीरव नभ से निशा सुन्दरी धर्काती दृग मोती है ?
किस सुख में 'पंकिल' धरा ह्रदय संपुटित संपदा खोती है ?"
रो रही निरुत्तर वही व्यथित बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥१९॥

04 November 2008

बावरिया बरसाने वाली 8

सुधि करो प्राण पूछा तुमने " वह पीर प्रिये क्या होती है ।

जिसकी असीम वेदना विकल हो निशा निरंतर रोती है।

आया न अभी ऋतुराज तभीं होती उजाड़ क्यों वनस्थली।

क्यों नंदनवन का प्रिय-परिमल बांटता प्रभंजन गली-गली ?

स्वप्निल निशि में क्यों चीख-चीख उठती न कोकिला सोती है?

निष्कंप दीप लौ पर पतंग बालिका कलेवर धोती है।"

बस टुकटुक मुख देखती रही बावरिया बरसाने वाली

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली॥ १५॥

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सुधि करो प्राण थी अंकगता किसलय काया अधखुले नयन।

श्लथ श्वांस सुरभि संघात जन्य थे काँप-काँप जाते पृथु स्तन।

छू मद-घूर्णित मेरे कपोल सिहरती रही कुंदन बाली।

तुम मृदु करतल से सहलाते थे मेरी अलकें घुंघुराली।

"जग में सर्वोत्तम कौन प्रिया?" पूछा था तुमने वनमाली ।

तब बाहुलता में बाँध तुम्हें मैं विहंस उठी कह "पंचाली"।

फिर भाव विलीन हुई तुममें बावरिया बरसाने वाली।

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥ १६ ॥

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भूलते न क्षण प्रियतम इंगित से तुमने मुझे बुलाया था।

प्राणेश्वरि! मत छोड़ना मुझे यह कहकर बहुत रुलाया था।

सुधि करो प्राण! रस-रंजित निशि में अवगुंठन-पट खींचा था ।

मृदु मदिर अधर पर 'पंकिल'-उर का प्रणय-पयोधि उलीचा था।

पूछा " भाती न उषा, संध्या पर क्यों बलिहारी होती हो ?

नीरव निशीथ में मधु शैय्या पर श्रद्धा-सुमन संजोती हो ?"

क्या कहे विराट प्राण ! बौनी बावरिया बरसाने वाली-

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥ १७॥

25 October 2008

बावरिया बरसाने वाली 7

सुधि करो प्राण पूछा तुमने "क्यों मौन खड़ी ब्रजबाला हो?

स्मित मधुर हास्य की मृदुल रश्मि से करती व्योम उजाला हो ।

तुम वारी-वीचि की सरसिज कलिका सी लेती अँगडाई हो ।

हो मरालिनी मानस सर की ऋतुराज सदृश गदराई हो।

क्यों मौन आँसुओं की भाषा सी दिए अधर पर ताला हो?

प्रिय मदिर नयन बंधूकअधर की ढरकाती मधुशाला हो।"

बस अपलक तुम्हें रही तकती बावरिया बरसाने वाली

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥१२॥

कहते थे "मौन उषा गवाक्ष से प्राण! झांकता सविता हो।

परिरंभण-व्याकुल युगल बाहु की अथवा तन्मय कविता हो।

हो बिम्बाधर अरुणाभ पाणिपद नवल नीरधर अभिरामा ।

ओ नवल नील परिधान मंडिता सित दशना कुंतल श्यामा।

री नव अषाढ़ की सजल घटा सी श्यामल कुंतल बिखराये।

अति चपल करों से चंचल अंचल अम्बर उर पर सरकाए ।

अब पलक उठा पूछे किससे क्या बावरिया बरसाने वाली-

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥१३॥

21 October 2008

बावरिया बरसाने वाली6

था कहा "धूसरित ग्रीष्म गगन या सरस बरसता पावस हो।
चांदनी चैत की हो डहकी या हेमंतिनी अमावस हो ।
प्रति दिवस जलज जयमाल लिए मैं सुमुखि करूंगा अभिनन्दन।
दृग ओट न होना निःसृत होगा हा राधा-राधा क्रंदन ।
कल-कंज विलोचन मदिर अधर की प्राण लुटाना मधुशाला।
मेरे जीवन की श्वांस-श्वांस हो तुम्ही सहचरी ब्रजबाला।"
गोविन्द हुई विस्मृत कैसे बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली।।१०॥

तुम मसृण पाणि मम पड़ सहला सो गए प्राण ले मधु सपना।
जब कहा "विदा बेला प्रियतम कर लूँ सम श्लथ दुकूल अपना ।"
कुछ कर्ण-कुहर में कह विहँसे तुम विधु-किरणोपम तिलक दिए।
प्रिया परिरम्भण में उठे खनक छूम-छननन नूपुर दुभाषिये।
पूछ "सखियाँ पूछेंगी ही स्वामिनि कैसे बीती रजनी ?"
बोले "दर्पण में निज कपोल चूमना ललक शतधा सजनी ।"
है वही कृष्ण-वारुणी पिए बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली।।११

18 October 2008

बावरिया बरसाने वाली 5

था कहा "अधर-रस-सुधा पिला" तन्वंगी ने तब था पूछा ।

क्या नाथ प्रणय प्रांगण का कलरव फिर हो जाएगा छूछा ।

घट रिक्त त्याग कर क्या हम फिर ले लेंगे मग अपना-अपना ।

वह फूट-फूट बिलखने लगी छीनो निज नाम न प्रिय अपना ।

दे गयी निगोड़ी दगा नींद तब अरुणशिखा ध्वनी थी गूँजी ।

श्यामल ने कहा जगा ही क्यों रोती होगी मेरी पूंजी।"

रख झूल गयी ग्रीवा में कर बावरिया बरसाने वाली ।

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥ ८॥


सुधि करो कहा था तुमने ही "चाहता नहीं कुछ और प्रिये!

तुम रहो तुम्हारा बंधन हो जग को दुलारता इसीलिये।

नीलाभ गगन पीताभ सुमन विहँसती पूर्णिमा राका हो ।

पावस घन से अभिसार हेतु उड़ती नभ बीच बलाका हो।

तुम अंकमालिका बनी निहारो कुटिल अलक स्वच्छंद किए ।

हमको इतना ही वांछित है जो जैसे चाहे जिए-जिए ।"

है वही पसारे पलक खड़ी बावरिया बरसाने वाली।

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥९॥

15 October 2008

बावरिया बरसाने वाली4

सिक्ता कर रही सुरंग चूनरी ऋतु पावसी निगोड़ी थी
स्मृति कौंध गयी कैसे मोहन से मचती होड़ा-होड़ी थी
किस विधि भींगा था पाग उपरना हार गए थे बनवारी
सिर नवा खड़े थे हरी ताली दे दे हंसती थी व्रजनारी
थे नवल किशोर कुञ्ज में स्थित दे कोमल कर में करमाला
शत-शत लीला तरंग स्मृति में बह गयी विरहिणी व्रजबाला
"
रसिकेश्वर!बात निहार रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली


बोली "सुधि करो प्राण !कहते थे हमने देखा है सपना
वह मधुबेला भूलती नहीं भूलता अधरों का कंपना
देखा था अनाघ्रात कलिका सी किए जलज लोचन नीचे
थी खड़ी वल्लभा वदन इंदु पर नील झीन अंचल खींचे
मृदु दर्पणाभ कोमल कपोल की हुई असित अरुणाई थी
नव कुबलय-दल-पड़-नख से रचती भू पर निज परछाईं थी
सपने
में अपना किया वही बावरिया बरसाने वाली -
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली

कहते "तव अरुण राग पद से भू अम्बर छपना देखा था
झलकते
नलिन लोचन दल से दृग सलिल टपकना देखा था
निज भुज प्रलंब से मसृण कलेवर थाम अंक में खींचा था
मधु अधर-पुटों पर 'पंकिल' उर का प्रणय-पयोधि उलीचा था
था प्राण! दलित-द्युति किसलय-वपु निकलती उष्ण थी दीर्घ श्वांस
और-और खींचते गए प्राणेश्वर ! मुझको और पास
विस्मृत कैसे हो गयी हाय बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली

14 October 2008

बावरिया बरसाने वाली3


पी कहाँ पी कहाँ रटे जा रहा था पपीहरा उत्पाती
घन गरज-गरज इंगित करते लाये मनमोहन पाती
मल्लिका
मंजू पर मचल रहे श्यामल मिलिंद मतवारे थे
नवकमल दण्ड मृदु दबा चंच में उड़े हंस सित प्यारे थे
थी बिछड़ गयी लावण्यमयी श्री राधा-माधव की जोरी
कर पल्लव जोड़ पुकार उठी वृषभान किशोरी अतिभोरी
"क्यों भूल गए प्राणेश! विकल बावरिया बरसाने वाली-
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली


भर रही अंग में थी अनंग-मद सिहर लहर पुरवईया की
लगता कदम्ब की डाल-डाल पर मुरली बजी कन्हैया की
घन की बूँदों ने भिंगो दिया कीर्तिदा कुमारी की काया
प्रिय संग घटी वृन्दावन की सुधियों का ज्वर उमड़ आया
केकी-नर्तन था इधर, उधर थिरकती जलद में थी चपला
नभ अवनि-बीच घी धूम रहे चुप कैसे, चीख उठी अबला
"
हो ललित त्रिभंग! कहाँ विकला बावरिया बरसाने वाली-
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली

13 October 2008

बावरिया बरसाने वाली2

थे नाप रहे नभ ओर-छोर चढ़ धारधार पर धाराधर ।

दामिनी दमक जाती क्षण-क्षण श्यामलीघटाओं से सत्वर ।

कल-कल छल-छल जलरव मुखरित था यमुना-पुलिन मनोहारी ।

तन से अठखेली कर बरबस खींचता प्रभंजन था सारी ।

परिरंभण में बांधे विटपों को थीं वल्लरी बिना बाधा।

अंचल पसार कर लगी बिलखने आ जा राधा के कांधा।

व्रजचंद्र! पधारो बिलख रही बावरिया बरसाने वाली।

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥ २॥

12 October 2008

बावरिया बरसाने वाली

व्रजमंडल नभ में उमड़-घुमड़ घिर आए आषाढ़ी बादल ।
उग गया पुरंदर धनुष ध्वनित उड़ चले विहंगम दल के दल ।
उन्मत्त मयूरी उठी थिरक श्यामली निरख नीरद माला ।
कर पर कपोल रखा निभृत कुञ्ज में अश्रु बहाती ब्रजबाला ।
मृदु कीर गर्भ पांडुर कपोल पर बिखर गयी कज्जल रेखा ।
विरहिणी राधिका उठी चीख जब जलद कृष्णवर्णी देखा ।
घनश्याम पधारो बिलख रही बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥

बैठो मेरे पास

साहित्य का एक बड़ा ही मर्मस्पर्शी और सर्वग्राही अर्थ है 'सहित होना', साथ होना - to be with. What to be with ?- to be with 'joy' - आनंद । आनंद के साथ रहना साहित्य का आलिंगित अर्थ है, अभिवांछित अर्थ है । बाकी सब साहित्य की इस सार्थक अर्थवत्ता के आनुषांगिक अर्थ हैं। इसीलिये साहित्य को मनीषियों ने 'ब्रह्मानन्दसहोदर' कहा है । पिताजी ने सदा साहित्य का यही आंचल पकड़ा है और इसे व्यवसाय और प्रदर्शन से अब तक दूर ही रखा है।
साहित्य के विविध आयामों में आप ने काव्य की धारा को आत्मसात किया है। संस्कृत के लक्षण ग्रंथों तथा हिन्दी के मध्य युगीन एवं विज्ञ अर्वाचीन कवियों ने भी राधा कृष्ण को उपजीव्य बना कर हृदयस्पर्शी रचनाओं से साहित्य की गोद भरी है । जानकी वल्लभ शास्त्री की राधा, धर्मवीर भारती की कनुप्रिया, हरिऔध का प्रियप्रवास, गुप्त जी की विरहिणी ब्रजांगना आदि रचनाएँ कभीं कल कवलित नहीं हो सकतीं । सत्य तो यह है कि पिताजी ने यह सर्वमान्य सत्य उद्घोषित किया है -
'सुन्दरता सरसता सभी की स्रोत मात्र गोविन्द प्रिया
टेर रहा वृन्दावनेश्वरी मुरली तेरा मुरलीधर ॥'
प्रोषितपतिका नायिका, विमुग्धा नायिका, अभिसारिका आदि के अनेकों अद्भुत मनमोहक बिम्ब साहित्य में समलंकृत हैं किंतु करुण रस का परिपाक स्मृतियों के झरोखे से जितना गोपीवल्लभ कृष्ण के लिए हुआ है उसका स्पर्श अन्य किसी रस में नहीं देखा गया है । क्या सूर की भ्रमरगीत की रचना का कोई सानी है?
सम्प्रति मैं पिताजी की एक लघुकाय कृति 'बावरिया बरसाने वाली ' के छंदों को क्रमशः अवगाहनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ । इसमें कालिदास के मेघदूत का विरही यक्ष स्पंदित दिखायी दे रहा है । अन्तर इतना ही है कि यक्ष ने मेघ से संदेशवाहक का कार्य लेकर अपनी स्मृतियों एवं निर्देशों का संप्रेषण किया, वहीं इस सरस करुण काव्य में स्मृतियों का संप्रेषण नहीं आलोड़न है । राधा श्रीकृष्ण के संग व्यतीत की हुई घडिओं का मानस पटल पर अनुरंजन करती हैं और उस स्मृति के झूले पर झूलती हुई उद्वेलित, आंदोलित,उद्भ्रांत,आकर्षित, पुलकित और परिव्यथित होती हैं। स्मृतियाँ कृष्ण को बुलाने के लिए हैं, कृष्ण को उलझाने के लिए नहीं। राधा की यह आत्मरति अपने आप में साहित्य की अमर धरोहर बनेगी, इस आशा के साथ मैंने अपने ब्लॉग में इस श्रृंखला को संयुक्त किया है । आगे इसी क्रम अन्यान्य रचनाएँ भी सुधी पाठकों के अनुशीलनार्थ, पिताजी की लेखनी से निःसृत कृतियों के समीक्षार्थ प्रेषित करता रहूँगा । संभवतः उनके साहित्यिक सांस्कृतिक ऋण का परिहार कर सकूं।