30 December 2009

सुधि उमड़ती रहे बदलियों की तरह ...

सुधि उमड़ती रहे बदलियों की तरह    ।
तुम झलकते रहो बिजलियों की तरह ॥

प्रभु हृदय में मेरे तुमको होगी घुटन
मैने गंदा किया सारा वातावरण 
ऐसे हिय में बिरह की सलाई लगा
प्राण सुलगें अगरबत्तियों की तरह     ||1||

दृष्टि बस फेर दो कष्ट कट जायेगा
कुछ तेरा सच्चे बाबा न घट जायेगा
उर की क्यारी में भगवन खिलो बन सुमन
मन मचलने लगे तितलियों की तरह ||2||

मैं हूँ दुनिया का सबसे बुरा आदमी
बोझ ढ़ोने में यदि चाहते हो कमी
मेरा अपराध-तरु झोर दो झर पड़ें
पाप सूखी हुई पत्तियों की तरह        ||3||

तेरी सुधि से बिलग मत रहे एक क्षण
मेरी हर श्वांस, हर रोम, हर रक्त-कण
अपनी चुटकी का बल आप देते रहें
मै थिरकता रहूँ तकलियों की तरह  ||4||

सोचते कौन तुम मेरी नेकी - बदी
ताल ‘पंकिल’ हूँ मैं तुम हो गंगा नदी
प्रेम चारा चुँगाते चलो चाव से
मैं निगलता चलूँ मछलियों की तरह  ||5||

 photo source : wikimedia
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ - 
# शायद आज मैं मिलूँगा तुमसे ...  (सच्चा शरणम )

22 December 2009

मुझे पाती लिखना सिखला दो...

मुझे पाती लिखना सिखला दो हे प्रभु नयनों के पानी से ।
बतला दो कैसे शुरू करुंगा किसकी राम कहानी से ।।

घोलूँगा कौन रंग की स्याही, किस टहनी की बने कलम
है कौन कला जिससे पिघला, करते हो लीलामय प्रियतम,
हे प्रभु तुम प्रकट हुआ करते हो, किस मनभावनि वाणी से-
मुझे पाती लिखना ...........................................।।1।।

कैसा होगा पावन पन्ना, कैसे होंगे अनुपम अक्षर
कोमल अंगुलि में थाम जिसे, तुम पढ़ा करोगे पहर-पहर,
कैसे खुश होंगे रूठ गये, क्या प्रभु मेरी नादानी से -
मुझे पाती लिखना ............................................।।2।।

अपनी प्रिय विषयवस्तु बतला दो, सच्चे प्रभु त्रिभुवन-साँईं
क्या कहाँ रखूँगा, कितनी होगी  प्रेम-पत्र की लम्बाई,
कब प्रभु अंतरतम जुड़ जायेगा सच्चे अवढर दानी से -
मुझे पाती लिखना ...........................................।।3।।

दृग-गोचर होंगे क्या न देव, कब तक लुक-छिप कर खेलोगे
इस मंद भाग्य को क्या न कभीं करूणेश ! गोद में ले लोगे
‘पंकिल’ मानस को मथा करोगे, अपनी प्रेम-मथानी से -
मुझे पाती लिखना ...........................................।।4।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ --
# करुणावतार बुद्ध - 7.....  (सच्चा शरणम)

16 December 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 40



तिल तिल तरणी गली नहीं दिन केवट के बहुरे मधुकर
वरदानों के भ्रम में ढोया शापों का पाहन निर्झर
सेमर सुमन बीच अटके शुक ने खोयी ऋतु वासंती
टेर रहा मानसप्रबोधिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।216।।

देह गेह कोई न तुम्हारा नश्वर संयोगी मधुकर
तुम तो प्रिय की गलियों में फिरने वाले योगी निर्झर
बहने दे उसके प्रवाह में सत्ता संज्ञाहीन परम
टेर रहा है आशुतोषिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।217।।

बिना अश्रु सच्चे प्रियतम तक पहुँचा ही है क्या मधुकर
सच्चा रस से पावन भावन और न कोई रस निर्झर
ठिठक न तू तो गोपीवल्लभ की गोपिका विकल बौरी
टेर रहा है अमर्यादिता  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।218।।

उसे याद आयेगी तेरी हल्की भी हिचकी मधुकर
व्यथा कथा अनकही तुम्हारी भी सब उसे ज्ञात निर्झर
मत घबरा वह माँ है लेगी करुण गोद में बिठा तुम्हें
टेर रहा है अन्तरंगिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।219।।

साधन साध्य नहीं वह सच्चा कृपा साध्य ही है मधुकर
देख तुम्हारी दीन दशा विह्वल हो उठता है निर्झर
वह मायास्वामी तू माया दास बॅंधा छटपटा रहा
टेर रहा है मायामुक्ता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।220।।

12 December 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 39

तरुण तिमिर देहाभिमान का तुमने रचा घना मधुकर
सुख दुख की छीना झपटी में चैन हुआ सपना निर्झर
धूल जमी युग से मन दर्पण पर हतभागी जाग मलिन
टेर रहा तनतुष्टिनिरस्ता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।211।।

पलकें खुलीं रहीं दिन दिन भर पर तू जगा कहाँ मधुकर
दिवास्वप्न ताने बाने बुनने में व्यस्त रहा निर्झर
किया याचना मंदिर मंदिर बना भिखारी का जीवन
टेर रहा है मोहमर्दिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।212।।

चैत्र बौर बैशाख भोर सी जेठ छाँह जैसी मधुकर
घटा अषाढ़ी श्रावण रिमझिम भाद्र दामिनी सी निर्झर
आश्विन की चन्द्रिका कार्तिकी पवन अगहनी सरिता सी
टेर रहा रोमांचकारिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।213।।

पूष दुपहरी माघ अनल फाल्गुनी फाग जैसी मधुकर
उसकी सेज स्पर्श आकृति स्मिति करुणामयी दृष्टि निर्झर
निज खोना ही उसको पाना श्वाँस श्वाँस में रचा बसा
टेर रहा आनन्दनिर्झरी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।214।।

दो अतियों के बीच झूल तू सुखी न रह सकता मधुकर
बहुत कसी अति श्लथ वीणा से राग न बह सकता निर्झर
चलनी में जल भर भर अपना गला सींच पायेगा क्या
टेर रहा है दृगोन्मीलनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।215।।
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# स्वर अपरिचित....  (सच्चा शरणम )

11 December 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 38

वह विराम जानता न क्षण क्षण झाँक झाँक जाता मधुकर
दुग्ध धवल फूटती अधर से मधुर हास्य राका निर्झर
प्रीति हंसिनी उसकी तेरे मानस से चुगती मोती
टेर रहा है अविरामछंदिनी  मुरली  तेरा  मुरलीधर।।206।।

अंगारों पर भी प्रिय से अभिसार रचाता चल मधुकर
अज अनवद्य अकामी को लेना बाँहों में भर निर्झर
जन्म जन्म के घाव भरेंगे फूल बनेंगे अंगारे
टेर रहा है जयजयवंती मुरली   तेरा    मुरलीधर।।207।।

वह अद्भुत रस की हिलोरमय सिंधु कुलानन्दी मधुकर
शिशु अबोध मुकुलित किशोर वह युवा जरठ काया निर्झर
मुक्ता मण्डित निलय वही वह तृण कुटीर पल्लव पंकिल
टेर रहा है स्वबसचारिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।208।।

प्रिय चिंतन प्रिय रस मज्जन ही रुचिर सुरंग सरस मधुकर
उससे होकर अपर जगत में कर सकता प्रयाण निर्झर
एक अनिर्वच दिव्य ज्योति में तुमको नख शिख नहला कर
टेर रहा है आलोकपंखिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।209।।

मन चाहा अंचल कब किसको जग में मिल पाता मधुकर
बुझती तृषा न अधर आस में सूखा रह जाता निर्झर
लेता कूल छीन लहरों की सब उर्मिल अभिलाषायें
टेर रहा है तृप्तिपयोदा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।210।।
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# करुणावतार बुद्ध-५   (सच्चा शरणम )

05 December 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 37

उसके संग संग मिट जाते सभी उदासी स्वर मधुकर
फूल हॅंसी के नभ से भू पर झरते हैं झर झर निर्झर
उसके नयन जलद कर देते प्राण दुपहरी को पावस
टेर रहा है हृदयाह्लादिनि मुरली   तेरा    मुरलीधर।।201।।

कौन तुला जिस पर तौलेगा उसका अपनापन मधुकर
जैसा वह गा रहा कौन वैसा गाने वाला निर्झर
हर स्वर उसकी ही पद पैजनि हर द्युति उसकी ही चपला
टेर रहा है सर्वास्वादा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।202।।

पग पग पर चल रहा संग तेरी अंगुली थामे मधुकर
क्षण क्षण पूछ रहा मुस्काता तेरा क्षेम कुशल निर्झर
स्वयं भॅंवर में कूद खे रहा तेरी जीवन जीर्ण तरी
टेर रहा है सदासंगदा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।203।।

रे बौरे वासना वाटिका में न ठिठक जाना मधुकर
रीझ किसी छलना छाया पर मन मत ललचाना निर्झर
बुला रही है प्राणेश्वर की शीतल सुखद अंक छाया
टेर रहा है प्राणशरण्या मुरली   तेरा    मुरलीधर।।204।।

उसकी पीर न सोने देगी उमड़ेंगे लोचन मधुकर
अकुलायेंगे प्राण अकेले में बेसुध हो हो निर्झर
अरुण उषा की प्रथम पुलक सी अंग अंग कर रोमांचित
टेर रहा उच्छ्वसितअंतरा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।205।।
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# प्राणों के रस से सींचा पात्र : बाउ (गिरिजेश भईया की लंठ-महाचर्चा)

26 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 36

कोना कोना प्रियतम का जाना पहचाना है मधुकर
इठलाता अटपटा विविध विधि आ दुलरा जाता निर्झर
शब्द रूप रस स्पर्श गन्ध की मृदुला बाँहों में कस कस
टेर रहा है अनन्तआस्वादा मुरली तेरा मुरलीधर।।196।।

हिला हिला दूर्वादल अंगुलि बुला रहा तुमको मधुकर
पर्वत पर्वत शिखर शिखर पर टेर रहा सस्वर निर्झर
चपल जलद पाणि से भेंज भेंज कर संदेशा
टेर रहा है आनन्दपर्विणी मुरली  तेरा मुरलीधर।।197।।

विरही तेरे श्याम न आये कैसे जीवित है मधुकर
तन में ग्रीष्म नयन में पावस भर उर में बसन्त निर्झर
मुख हेमन्त शरद गण्डस्थल चल रोमावलि शिशिर बना
टेर रहा है ऋतुरसस्विनी मुरली तेरा  मुरलीधर।।198।।

उसके अधरों से सीखा सुमनों ने मुस्काना मधुकर
उसके अधरों से ही सीखा कोकिल ने गाना निर्झर
छलकाता रहता मयंक उसके अधरों का अमृत
टेर रहा अधरामृतवर्षिणी मुरली  तेरा  मुरलीधर।।199।।

बॅंध बॅध कर रुक रुक जाता वह लघु में भी विराट मधुकर
थकते कभीं न उसके गाते अधर मिलन के स्वर निर्झर
मुँदी पलक में भी  वह नटखट आ रच लेता है शय्या
टेर रहा है स्वजनकंचुकी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।200।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# पराजितों का उत्सव : एक आदिम सन्दर्भ - ३ (सच्चा शरणम)

24 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 35

चिर विछोह की अंतहीन तिमिरावृत रजनी में मधुकर,
फिरा बहुत बावरे अभीं भी अंतर्मंथन कर निर्झर
सुन रुनझुन जागृति का नूपुर खनकाता वह महापुरुष
टेर रहा है अनहदनादा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।191।।

पी उसकी स्मिति सुधा प्रफुल्लित दिगदिगन्त अम्बर मधुकर
विहॅंसित वन तृण पर्ण धवलतम तुहिन हिमानी कण निर्झर
मधुर मदिर प्राणेश हॅंसी में डूब डूब उतराता चल
टेर रहा है प्रीतिपंखिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।192।।

उमड़ घुमड़ घन मोहन का संदेशा ले आये मधुकर
इधर तुम्हें रोमांच उधर वे भी पुलके होंगे निर्झर
वे भींगे होंगे आये हैं तुम्हें भींगाने को बादल
टेर रहा है मेघरागिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।193।।

तेरा जीवन गेंद गोद ले रखे गिरा दे या मधुकर
मृदु कर से सहलाये अथवा चरण ताड़ना दे निर्झर
तू उसका है जैसे चाहे तुमसे खेले खिलवाड़ी
टेर रहा है मुक्तमानसा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।194।।

कितनी करुणा है उसकी कल्पना न कर सकता मधुकर
जितना डूबेगा उतना ही आनन्दित होगा निर्झर
उसका दण्ड विधान कोप भी सदा अनुग्रह मय सुखमय
टेर रहा है त्रिवर्गफलदात्री मुरली   तेरा    मुरलीधर।।195।।


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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# पराजितों का उत्सव : एक आदिम संदर्भ-२ (सच्चा शरणम )

20 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 34

सुन अनजान प्राणतट का मोहाकुल आवाहन मधुकर
रस सागर की तड़प भरी सब चाहें ममतायें निर्झर
स्मरण कराता जन्म जन्म के लिये दिये अनगिन चुम्बन
टेर रहा है प्रीतिमादिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।186।।

मृदु गलबहियाँ दे बन जाता हार तुम्हारा वह मधुकर
सब अनखिला खिला देता है उसका मधु दुलार निर्झर
उसकी बाँहों की डाली में रसमय झूला झूल नवल
टेर रहा ऋतुराजनियोगा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।187।।

उसका ही विहार वृन्दावन कर अपना अंतर मधुकर
नयनों में प्राणेश मिलन का भर ले सजल सरस निर्झर
तू क्या जाने निपट अनाड़ी कब रच दे कैसी लीला
टेर रहा है चित्तचोरिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।188।।

रख स्मृति वही प्राणवल्लभ सिन्दूर रेख तेरी मधुकर
वह भावना चित्रलेखा वह कुंकुम भाल तिलक निर्झर
दूर नहीं प्रति श्वांस श्वांस में वह मंगलमय मनमोहन
टेर रहा जीवनश्रृंगारा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।189।।

भग्न पाल अनभिज्ञ खेवैया जीवन जीर्ण तरी मधुकर
क्षुभित जलधि प्रतिकूल प्रभंजन फिर भी चलता चल निर्झर
उसका है तो फिर क्या चिन्ता आयेगा खेनेवाला
टेर रहा है संकटहरणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।190।।
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# करुणावतार बुद्ध - 3 (सच्चा शरणम )

18 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 33

बिक जा बिन माँगे मन चाहा मोल चुका देता मधुकर
जगत छोड़ देता वह आ जीवन नैया खेता निर्झर
कठिन कुसमय शमित कर तेरा आ खटकाता दरवाजा
टेर रहा है प्रीतिपीठिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।176।।

रहे न तुम वह था न रहोगे तब भी वह होगा मधुकर
टेर रहा तेरे अंचल की छाया में लुक छिप निर्झर
भींगी पलकें पोंछ तुम्हें ले अंक भाल सहला सहला
टेर रहा है प्रीतिमेदिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।177।।

क्या होती है थकित चकोरी पी पी चन्द्र किरण मधुकर
कहाँ पी कहाँ रटते थकते चातक के न अधर निर्झर
रहो पंथ में आँख बिछाये प्रिया गमन के दिन गिनते
टेर रहा है प्रीतिचातकी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।178।।

पश्चातापी नयन सलिल दिन रात बहाता रह मधुकर
बिलख हाय मिल सका न प्रिय का मिलन महोत्सव रस निर्झर
अनायास ही अनुकंपा से आ जायेगा वह नटवर
टेर रहा है प्रीतिभामिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।179।।

जब प्रयाणरत प्राणों की होगी कम्पित बाती मधुकर
शोकाकुल आँगन बिरवा की सूखेगी छाती निर्झर
तुम्हें अंक में ले रच देगा माथे पर सौभाग्य तिलक
टेर रहा है प्रीतिमंजरी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।180।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# करुणावतार बुद्ध  (सच्चा शरणम )

16 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 32

अपने ही लय में तेरा लय मिला मिला गाता मधुकर
अक्षत जागृति कवच पिन्हा कर गुरु अभियान चयन निर्झर
तुमको निज अनन्त वैभव की सर्वस्वामिनी बना बना
टेर रहा है भूतिभूषणा मुरली  तेरा   मुरलीधर।।171।।

दृग खुलते झलकता पलक झंपते ही आ जाता मधुकर
बुला लिया है तो न लौटकर फिर जाने देता निर्झर
कभीं न कुम्हिलाने वाली अपनी वरमाला पहनाकर
टेर रहा है रहसरंगिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।172।।

सुख दुख पाप पुण्य दिन रजनी मरण अमरता में मधुकर
ऊर्ध्व अधः सुर असुर जीव जगदीश्वर में न बॅंधा निर्झर
निगम ‘‘रसोवैसः आनन्दोवैसः’’ कह करते गायन
टेर रहा है श्रुत्यर्थमण्डिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।173।।

श्वेत केश मुख दशन रहित कटि झुकी जरा जरजर मधुकर
रस विरहित शोणित वाहिनियाँ झूली श्लथ काया निर्झर
देखो जीवन छाया पट पर उसका यह भी चित्रांकन
टेर रहा है रचनाविशारदा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।174।।

अश्रु मुखी अनमनी म्लान रहने न तुम्हें देगा मधुकर
अपने दिनमणि पर भरोस रख तू सरसिज कलिका निर्झर
तेरी पीड़ा का निदान है प्रियतम की अम्लान हॅंसी
टेर रहा है लोमहर्षिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।175।।

14 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 31

 बार बार पथ घेर घेर वह टेर टेर तुमको मधुकर
तेरे रंग महल का कोना कोना कर रसमय निर्झर
सारा संयम शील हटाकर सटा वक्ष से वक्षस्थल
टेर रहा है हृदयवल्लभा मुरली  तेरा  मुरलीधर।।166।।

हृदय सिंधु के द्युतिमय मोती पलकों में भर भर मधुकर
सच्चा सरसिज मृदुल चरण पर अर्घ्य चढ़ाता चल निर्झर
वह पूर्णेन्दु प्राण वारिधि में स्नेहिल लहरें उठा उठा
टेर रहा है प्रीतिकातरा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।167।।

प्रेम बावरे पर यह जग कीचड़ उछालता है मधुकर
प्रेम पथिक को स्वयं बनाना पड़ता अपना पथ निर्झर
पथ इंगित करती दुलराती प्रियतम की प्रेरणा कला
टेर रहा है  प्रीतिप्रगल्भा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।168।।

अद्भुत उसका खेल बिन्दु में सिन्धु उतर आता मधुकर
लहर लहर में उठ सागर ही बिखर बिखर जाता निर्झर
नभ पट पर उडुगण लिपि में लिख नित नित नूतन संदेशा
टेर रहा है प्रीतिपत्रिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।169।।

जाने तुममें क्या पाता नित बन ठन कर आता मधुकर
तृप्त न होता पुनः पुनः वह चूम चूम जाता निर्झर
मिलन प्रतीक्षा की वेला बन करता लीला रस वर्षण
टेर रहा है मिलनमंदिरा मुरली  तेरा   मुरलीधर।।170।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है ...   (सच्चा शरणम )

12 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 30

ज्यों तारक जल जल करते हैं धरती को शीतल मधुकर
नीर स्वयं जल जल रखता है यथा सुरक्षित पय निर्झर
वैसे ही मिट मिट प्रियतम को सत्व समर्पण कर पंकिल
टेर रहा है सत्वसंधिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।161।।

प्राणों की मादक प्याली में प्रेम सुधा भर भर मधुकर
घूँघट उठा निहार मुदित मुख तुम्हें पिलाता रस निर्झर
मोहित मन की टिमटिम करती स्नेहिल बाती उकसाकर
टेर रहा है प्रीतिपिंजरा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।162।।

उसकी स्मृति में रोती रजनी गीला पवनांचल मधुकर
उसकी स्मृति की गहन बदलियों से बोझिल अम्बर निर्झर
प्रेमासव की एक छलकती कणिका के हित लालायित
टेर रहा है प्रीतिकोकिला मुरली   तेरा    मुरलीधर।।163।।

बड़ी निराली गुणशाली सच्चे की मधुशाला मधुकर
जिसे पकड़ती उसको ही कर देती मतवाला निर्झर
निजानन्द का स्वाद चखाती उमग उमग आनन्दमयी
टेर रहा है प्रेमतरंगा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।164।।

मरना सच्चा रस तो तू सोल्लास वहीं मर जा मधुकर
यदि वह निद्रा है तो उसमें ही सहर्ष सो जा निर्झर
उसका स्नेहिल उर स्पर्शित कर बहने दे पंकिल श्वांसें
टेर रहा है स्नेहाकुंरिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।165।।

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 अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# मैं तो निकल पड़ा हूँ ...(सच्चा शरणम )

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22 October 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 29

मन सागर पर मनमोहन की उतरे मधु राका मधुकर
प्राण अमा का सिहर उठे तम छू श्रीकृष्ण किरण निर्झर
प्रियतम छवि की अमल विभा से हो तेरा तन मन बेसुध
टेर रहा है भुवनसुन्दरी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।156।।

प्राणेश्वर अभ्यंग सलिल की सुधा जाह्नवी में मधुकर,
मज्जन कर उनके पद पंकज रज का कर चंदन निर्झर
प्राण कलेवा के जूठन का कर ले महाप्रसाद ग्रहण
टेर रहा है प्रीतिमधुमती  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।157।।

चिदानन्दमय उस काया की छाया चूम चूम मधुकर
उसकी पद रज में बिछ जा उड़ उसके अम्बर में निर्झर
कर परिक्रमा उसकी उससे सीख सुहागिन प्रीति कथा
टेर रहा है प्रेमपर्वणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।158।।

सात्विक श्रद्धा दीवट पर  विश्वास प्रदीप जला मधुकर
प्राण गुफा से बहने  दे प्रिय मिलन राग सस्वर निर्झर
ललक उतरने दे पलकों पर कृष्ण प्रतीक्षा का पंछी
टेर रहा है प्रीतिचन्दिनी मुरली  तेरा   मुरलीधर।।159।।

जन्म जन्म की कृपण भावना हरने को उत्सुक मधुकर
रोम रोम में पीर नयन में भर भर अश्रु सलिल निर्झर
निज मधुमय परिचय देने को आतुर प्रियतम उमग उमग
टेर रहा है प्राणसंगिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।160।।

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19 October 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 28

उसका ही विस्तार विषद ढो रहा अनन्त गगन मधुकर
मन्दाकिनी सलिल में प्रवहित उसकी ही शुचिता निर्झर
उस प्रिय का अरविन्द चरण रस सकल ताप अभिशाप शमन
टेर रहा पीयूशवर्षिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।151।।

मिलन स्वप्न कर पूर्ण जाग मनमोहन मंदिर में मधुकर
रसमय सच्चालोकवलय में  बनकर शून्य बिखर निर्झर
प्राणेश्वर मंदिर के दीपक की बाती बन तिल तिल जल
टेर रहा है शून्यसहचरी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।152।।

प्राणों में अनुभूति न तो सब व्यर्थ साधनायें मधुकर
सपनों का कंकाल ढो रहा मृगमरीचिका में निर्झर
सुन अक्षत शाश्वत कलरव से तेरा मन कर उद्वेलित
टेर रहा है चिरअभीप्सिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।153।।

महाप्राण बन महाप्राण कर परिवर्तन अपना मधुकर
धो दे प्रियतम प्रीति किरण से चिर तमिस्र अंतर निर्झर
गुण अवगुण पंकिल मारुत में कर मत कंपित बोध शिखा
टेर रहा है गतिरनुत्तमा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।154।।

बरसें तेरे विरही लोचन उमड़े सुधि बदली मधुकर
तरल पीर बन दृग पलकों से झरने दे स्नेहिल निर्झर
प्रभु अनुराग घटा पंकिल हो प्राण गगन कोना कोना
टेर रहा सच्चाम्बुपयोदा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।155।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# मेरी अमित हैं वासनायें (गीतांजलि का भावानुवाद)... (सच्चा शरणम )

17 October 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 27

खड़े दर्शनार्थी अपार दरबार सजा उसका मधुकर
उपहारों की राशि चरण पर उसके रही बिछल निर्झर
मुखरित गृह मुँह जोह रहे सब किन्तु न जाने क्यों आकुल
टेर रहा है प्रियाविरहिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।146।।

प्रथम रश्मि की स्मिति में मधुरिम खोल कमल आनन मधुकर
नभ में उड़ते जलद विहंगम के स्वर गीतों में निर्झर
चपल प्रभंजन जलधि तरंगों में कर तेरा नाम स्मरण
टेर रहा  स्वजनानुसंधिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।147।।


माँग माँग सच्चे शतदल से रस पीयूष तृषित मधुकर
विजय पराजय हर्ष रुदन से क्षुभित न कर अंतर निर्झर
वह तेरी श्रम सिक्त अलक पर स्नेहिल अंगुलि फिरा फिरा
टेर रहा अमन्दआत्मीया  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।148।।

तम से क्या भय वह तेरे साँवलिया की छाया मधुकर
मरण भीति क्या वह सच्चे प्रियतम की कर शय्या निर्झर
दुख तो उसका तीर्थाटन आनन्द पुलक में प्रकट वही
टेर रहा निर्भयानन्दिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।149।।

वायु प्रकाश सलिल भू अम्बर उसके मधुर छन्द मधुकर
उस विराट के रागाकर्षण का नित सजल स्रोत निर्झर
उस की ही चेतना विश्व का प्रलय सृजन फेनिल पंकिल
टेर रहा है दिगदिगंतिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।150।।


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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# एक दीया गीतों पर रख दो …. (सच्चा शरणम )

13 October 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 26

देख शरद वासंती कितने हुए व्यतीत दिवस मधुकर
काल श्रृंखलाबद्ध अस्त हो जाता भास्वर रवि निर्झर
भग्न पतित कमलों की परिमल सुरभि उड़ा ले गया पवन
टेर रहा है कालविजयिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।141।।

मूढ़ जुटाता रहा मनोरथ के निर्गंध सुमन मधुकर
सच्चा के अर्चा की मधुमय वेला बीत गयी निर्झर
अंध तिमिर में अहा भटकता तू अब भी दिग्भ्रान्त पथिक
टेर रहा है दिशालोकिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।142।।

शरद पूर्णिमा में ज्योत्सना का फेनिल हास बिछा मधुकर
भ्रमित पवन में गन्ध लता का कर मुखरित नर्तन निर्झर
करुण पपीहा के स्वर में झंकृत कर प्राणों की वीणा
टेर रहा है विरहोच्छ्वसिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।143।।

एक एक कर खुली जा रहीं सारी नौकाएँ मधुकर
स्वागत में बाँहें फैलाये स्थित ज्योतिर्मय रस निर्झर
तू कैसी गोपी बैठी ले मुरझायी पंकिल माला
टेर रहा है चारुहासिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।144।।

तेरी भग्न वीण से कोई राग नहीं झंकृत मधुकर
स्तंभित चरण नृत्य के तेरे स्तब्ध हुए नूपुर निर्झर
और न कुछ आँसू तो होंगे उनका ही ग्राहक सच्चा
टेर रहा है जगदालम्बा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।145।।


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अन्य चिट्ठॊं की प्रविष्टियाँ -

# तुमने मुझे एक घड़ी दी थी ….  (सच्चा शरणम )

11 October 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 25

भेंट सच्चिदानन्द ईश को मुक्त प्रभंजन में मधुकर
सत निर्मल आकाश पवन चित नित तेजानन्द सतत निर्झर
विविध वर्णमयि विश्व वस्तुयें प्रियतम का रंगालेखन
टेर रहा है चित्रमालिनी  मुरली  तेरा    मुरलीधर।।136।।

सच्चा संस्तुत अपरिग्रह ही श्वांसोच्छ्वास समझ मधुकर
तन की तुष्टि सम्हाल रच रहा तू जीवन बंधन निर्झर
मुख्य परिग्रह देह देह का भाव न रख निर्भार विचर
टेर रहा है मुक्तछंदिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।137।।

मेघ वारि बरसते नहीं देखते शैल गह्वर मधुकर
व्यर्थ सलिल बहता रह जाती रिक्ता गिरि माला निर्झर
पूर्वभरित में क्या भर सकता नहीं वहाँ कोई उत्तर
टेर रहा  रिक्तान्वेषिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।138।।

जान न कुछ जीवन धन को ही जान पूर्णता में मधुकर
यही तुम्हारा चरम लक्ष्य सब धर्म धारणायें निर्झर
सीखा ज्ञान भुला निहार ले प्रभु रचना आश्चर्यमयी
टेर रहा आश्चर्यमंदिरा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।139।।

विकट पेट की क्षुधा पूर्ति हित विविध स्वांग रच रच मधुकर
मायावी नट सरिस वंचना का विधान रचता निर्झर
हीरा जीवन राख कर दिया बना कीच पंकिल पगले
टेर रहा है ब्रह्मविहरिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।140।।


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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# के० शिवराम कारंत : मूकज्जी के मुखर सर्जक .. (सच्चा शरणम )

09 October 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 24

भूत मात्र में व्याप्त ईश का सूत्र न छोड़ कभीं मधुकर
कर्म त्याग संभव न त्याग भी तो है एक कर्म निर्झर
रज्जु सर्प ताड़न या उससे सभय पलायन व्यर्थ युगल
टेर रहा है तत्वदर्शिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।131।।

आत्मा शिव शव देंह तुम्हारा जीवन ही मरघट मधुकर
नर शरीर की पकड़ कुल्हाड़ी काट अपर काया निर्झर
हो निमित्त अहमिति तज बन जा कृष्ण कराम्बुज की मुरली
टेर रहा है कृपावर्षिणी  मुरली  तेरा  मुरलीधर।।132।।

अरे विचार प्रबल मारुत में झिझक ठिठक ठहरा मधुकर
तेरे गतिमय चिन्तन की भी हुई अदृश्य दिशा निर्झर
ऐसी स्थिति में करुण ईश्वर की कृपा बिना है त्राण कहाँ
टेर रहा है लाललालिता मुरली  तेरा  मुरलीधर।।133।।

नर गृह में दीवार दोष  हैं गुण ही दरवाजा मधुकर
दीवारों से ही टकरा क्यों फोड़ रहा है सिर निर्झर
दृग न खुले या फिरा निरर्थक दोनों ही तो अंधापन
टेर रहा उन्मिलितनयना  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।134।।

वस्तु स्वरूप बदलतीं क्षण क्षण मिथ्या इसे न कह मधुकर
लीलाधर की प्रकट भंगिमायें हैं सभी समझ निर्झर
बुद्धि न श्रद्धा सदृश पावनी श्रद्धा सम बलवान कहाँ
टेर रहा श्रद्धातरंगिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।135।।


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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# मैं सहजता की सुरीली बाँसुरी हूँ … (सच्चा शरणम )

07 October 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 23

मुख मन अन्तर श्वाँस श्वाँस सब सच्चामय कर दे मधुकर
सच्चा प्रेम सार जग में कुछ और न सार कहीं निर्झर
जागृति स्वप्न शयन में तेरे बजे अखण्ड वेणु उसकी
टेर रहा अनवरतगुंजिता  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।126।।
जो कर रहा प्राणधन तेरा भला कर रहा है मधुकर
क्या उलाहना कैसा संशय यह कैसा विषाद निर्झर
श्रद्धा में संदेह न रख बस कह दे तू ही कर जो कर
टेर रहा है अर्पितान्तरा  मुरली तेरा मुरलीधर।।127।।

चाह रहा सुख मिलता है दुख ही दुख क्यों तुमको मधुकर
संशय सर्प ग्रसित क्षण क्षण कंपित मन तू रहता निर्झर
लक्ष्य बेध से चूक संशयी दुखी रहेगा ही  निश्चय
टेर रहा लक्ष्यवेधिनी  मुरली  तेरा   मुरलीधर।।128।।

शोभामय अति अज्ञान क्यों कि है क्षमावान मोहन मधुकर
गिरा तोतली भली क्योंकि है स्नेहमयी जननी निर्झर
सृष्टि परमप्रिय क्योंकि मधुर सच्चास्वरूपिणी रम्य सदा
टेर रहा सर्वांगसुन्दरी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।129।।

चाहे जैसी भी जीवन में प्राप्त परिस्थिति हो मधुकर
उसको भाग्य बना लेने की कला सीखता चल निर्झर
सच्चा से नाता हो तो घर आ जाते सौभाग्य सकल
टेर रहा है भाग्यविधात्री मुरली तेरा  मुरलीधर।।130।।

 


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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ :

# याद कर रहा हूँ तुम्हें सँजो कर अपना एकान्त..  (सच्चा शरणम )

03 October 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 22

दुख का मुकुट पहन कर तेरे सम्मुख सुख आता मधुकर
सुख का स्वागत करता तो दुख का भी स्वागत कर निर्झर
सुख न रहा तो दुख भी तेरे साथ नहीं रहने वाला
टेर रहा क्रीड़ाविशारदा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।121।।

प्रेम भिखारी न उससे कुछ भी माँग कभीं मधुकर
बूँद बूँद अपनी निचोड़ कर अर्पित कर देना निर्झर
उसका रस पी अनरस देंगी स्वयं वस्तुएँ छोड़ तुम्हें
टेर रहा है सुधिपयस्विनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।122।।

गृह में  रखी स्वर्णमंजूषा देख देख तस्कर मधुकर
सो सकता है कभीं न सुख की नींद स्वर्णलोभी निर्झर
सच्चा प्रेमी कर सकता क्या अपर वस्तु से स्नेह कभीं
टेर रहा है स्वात्महिरण्या मुरली   तेरा    मुरलीधर।।123।।

तू सच्चा स्मृति का शतदल बन पॅंखुरी पॅंखुरी खिल मधुकर
झुण्ड झुण्ड फिर मॅंडरायेंगे लोभी भाव भ्रमर निर्झर
ऊर्ध्वमुखी इन्द्रियाँ परिष्कृत चित्त बना मन कृष्णमना
टेर रहा है मुक्तिहंसिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।124।।

सार्थकता है यही बीज की उससे फूटे तरु मधुकर
तरु सार्थक है जब उस पर झूलें अभिलाष सुमन निर्झर
किन्तु अभीप्सा ही न मचलती रहे उसे फलवती बना
टेर रहा है फलितवल्लरी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।125।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

नमन् अनिर्वच ! (गांधी-जयंती पर विशेष ) …….. (सच्चा शरणम )

28 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 21

स्वाद सुधा में है पदार्थ में स्वाद न पायेगा मधुकर
सुख तो सब उसे सच्चे प्रिय में कहाँ खोजता रस निर्झर
मन गृह में जम गयी धूल को पोंछ डाल आनन्द पथी
टेर रहा संसारनाशिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।116।।

यदि संस्कार वासनाओं से पंकिल बना रहा मधुकर
लाख रचो केसर की क्यारी कस्तूरी का रस निर्झर
अरे प्याज तो प्याज रहेगी वहाँ सुरभि खोजना वृथा
टेर रहा है सुरभिनिमग्ना मुरली   तेरा    मुरलीधर।।117।।

विश्व प्रकट परमात्मा ही है तुम शरीर यह भ्रम मधुकर
तुम ईश्वर हो ईश्वर के हो बोध न कर विस्मृत निर्झर
ईश बना मानव तो फिर से मानव ईश बनेगा ही
टेर रहा है निजस्वरूपिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।118।।

तुम अपने को देह मान ही जग से अलग थलग मधुकर
जीव  मान कर ही अनन्त पावक का एक स्फुलिंग निर्झर
आत्म स्वरूप समझ लेते ही फिर विराट हो विश्व तुम्हीं
टेर रहा ब्रह्माण्डगोचरा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।119।।


कृष्ण प्रीति सरि में न नहाया खाली हाथ गया मधुकर
रिक्त हस्त ही अपर जन्म में फिर रह जायेगा निर्झर
कण कण में झंकृत है उसकी स्वर लहरी उल्लासमयी
टेर रहा है योनिरुत्तमा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।120।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# अति प्रिय तुम हमसे अनन्य हो गये..  (सच्चा शरणम )

26 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 20

इन्द्रिय घट में भक्ति रसायन भर भर चखता रह मधुकर
तन्मय चिन्तन सच्चा रस में देता तुम्हें बोर निर्झर
कर त्रिकाल उस महाकाल के चरणामृत का आस्वादन
टेर रहा नैवेद्यतुलसिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।111।।

मन तो नित गिरता रहता है सलिल सदृश नीचे मधुकर
कृष्ण स्मरण का यंत्र उसे ले उर्ध्व बना देता निर्झर
सब संयोग वियोग जगत का हरि स्मृति में न वियोग कभीं
टेर रहा संयोगसंधिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।112।।
मिली वासना से ही काया इसे  स्मरण रखना मधुकर
फिर जैसी वासना तुम्हारी वैसा होगा तन निर्झर
बनना नहीं जनक जननी अब नहीं किसी की त्रिया तनय
टेर रहा वैराग्यदीपिका  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।113।।

इस मल मूत्रभरित तन में मत प्रेम बाँटता फिर मधुकर
प्रेम पात्र बस सच्चा प्रियतम संसृति में न भटक निर्झर
भुक्ता भोग्य सभी मिट जाते रस ही रस वह प्राणेश्वर
टेर रहा है रसकदम्बिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।114।।

नहीं काष्ठगत अप्रकट पावक ऊष्मा देता है मधुकर
भीतर की प्रकटिता अग्नि जब तब होती दाहक निर्झर
बाहर भीतर के नारायण को कर एकाकार स्वरित
टेर रहा सारूप्यसुन्दरी   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।115।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# मैंने जो क्षण जी लिया है … (सच्चा शरणम )

22 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 19

अहं रहित मह मह महकेंगे तेरे प्राण सुमन मधुकर
स्निग्ध चाँदनी नहला देगी चूमेगा मारुत निर्झर
तुम्हें अंक में ले हृदयेश्वर हलरायेगा मधुर मधुर
टेर रहा है मूलाधारा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।106।।

उर वल्लभ के पद शतदल में मरना मिट जाना मधुकर
रस समाधि में  खो जाते ही होगा सब अशेष निर्झर
अनजाने अबाध उमड़ेगी भावों की उर्मिल सरिता
टेर रहा है भावमालिनी  मुरली  तेरा  मुरलीधर।।107।।

एक न एक दिवस जीवन में मरण सुनिश्चित है मधुकर
कभीं मृत्यु विस्मृत न रहे यह सुधि जागृत रखना निर्झर
सात दिनों में कोई दिन निश्चित आयेगा लिये मरण
टेर रहा है मृत्युविजयिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।108।।

संसारी तू तन सम्हालता मन विचरता मुक्त मधुकर
तुम्हे न पता मृत्यु तन की मन साथ सदा रहता निर्झर
मन की ही सम्हाल करता चल सदा विवेकी धीर मना
टेर रहा चैतन्यरुपिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।109।।

तू न जगत का है अपने प्रभु का है यही सोच मधुकर
नहीं किसी प्रमदा का नर का केवल हरि का ही निर्झर
जीवन मरण बना ले दोनों सच्चा स्मृतिरसमय पंकिल
टेर रहा है मंगलसदनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।110।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# जागो मेरे संकल्प मुझमें … (सच्चा शरणम )

20 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 18

अपनी ही विरचित कारा में बंधा तड़पता तू मधुकर
अपनी ही वासना लहर से पंकिल किया प्राण निर्झर
उस प्रिय की कर पीड़ा हरणी चरण कमल की सुखद शरण
टेर रहा है प्रीतिपंकिला  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।101।।

गीत वही तेरे अधरों पर स्वर उसका ही है मधुकर
नयन तुम्हारे हैं जो उनकी ज्योति वही पुतली निर्झर
भर आये दृग की भाशा का वह पढ़ पढ़ संवादी स्वर
टेर रहा है मर्मभेदिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।102।।

अधरों पर मुस्कान सजा भर नयनों में पानी मधुकर
अपने प्राणों के राजा को भेंज प्रेम पाती निर्झर
गीत अधर पर सुधि सिरहाने रोम रोम में भर सिहरन
टेर रहा है प्रीतिविह्वला   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।103।।

कहाॅं भाग कर जायेगा प्राणेश वाटिका से मधुकर
तुम्हें मिलेगा गीत सुनाता नित नित नवल नवल निर्झर
शरद शिशिर हेमन्त वसन्ती ऋतु रवि शशि में हो द्युतिमय
टेर रहा है विराटवपुशीला  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।104।।

उसके सरसिज पद परिमल से निज सिर पंकिल कर मधुकर
क्या पाया उसको न सोच क्या खोया यही देख निर्झर
रिक्त बनोगे तो पाओगे प्रियतम प्राण रसाकर्शण
टेर रहा है निरहंकारा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।105।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# कैसे ठहरेगा प्रेम जन्म-मृत्यु को लाँघ .... (सच्चा शरणम)

14 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 17

वह कितनी सौभाग्यवती है अभिरामा वामा मधुकर
कुलानन्दिनी कीर्तिसुता की अंश स्वरुपा वह निर्झर
उसकी पद नख द्युति से कर ले अपना अंतर तिमिर हरण
टेर रहा है दुरितदारिणी   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।96।।

रो ले जी भर कर रो ले रे अश्रु अमोलक धन मधुकर
प्रियतम का पद कमल पखारें तेरे स्नेह नयन निर्झर
अभिनन्दन कर अश्रु अर्घ्य से लोक लाज कर आज विदा
टेर रहा है सलिलार्द्रलोचना  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।97।।

कृपण न बन अंतर की पीड़ा दृग में भरने दे मधुकर
छिपा न मूढ़ टपक जाने दे नयनों का व्याकुल निर्झर
ये संवादी अश्रु तुम्हारी सब कह देंगे व्यथा कथा
टेर रहा है पलकाश्रयिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।98।।

वृथा कटे जा रहे दिवस तू फूट फूट कर रो मधुकर
बिना रुदन के कभी उमड़ कर प्रवहित कहाँ प्राण निर्झर
ऋणी बना सकती प्रियतम को तेरी लघु आँसू कणिका
टेर रहा है रागवर्धिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।99।।

जो होगा होने दे पहले उससे भेंट ललक मधुकर
सच्चा रति से निर्मल कर ले अंतर का पंकिल निर्झर
समय कहाँ रे कब चेतेगा कब से देख रहा है पथ
टेर रहा है सम्प्रबोधिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।100।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# हिन्दी दिवस पर क्वचिदन्यतोऽपि.....   (सच्चा शरणम )

12 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 16

भर जाते नख शिख पावस घन विकल बरसने को मधुकर
जितनी प्यासी भू उतने ही प्यासे हैं नीरद निर्झर
तूँ जितना व्याकुल उतना ही व्याकुल है तेरा प्राणेश्वर
टेर रहा उद्वेलितान्तरा  मुरली तेरा  मुरलीधर।।91।।
इतना सुख इतनी सुन्दरता इतनी क्रीड़ायें मधुकर
इतनी अभिलाषायें इतनी रसमय आशायें निर्झर
और कहाँ केवल उसमें ही उसमें रम उसका ही बन
टेर रहा है नेहनिगमना  मुरली तेरा  मुरलीधर।।92।।
उस प्रिय की तज अमृत बिन्दु पी रहा हलाहल क्यों मधुकर
उसके रंग में क्यों न बावरे रंग देता जीवन निर्झर
देख मनोहर शरद चन्द्र सी हॅंसी विषाल विमल लोचन
टेर रहा है छविवारिषा  मुरली  तेरा  मुरलीधर।।93।।
भाव अभाव शुभाशुभ सुख दुख उसके वेणु रंध्र मधुकर
कौन छिद्र कब खोल बजा दे मौन करे किसको निर्झर
उसकी लीला का विलास ही आगत विगत अनागत सब
टेर रहा भवविभवकारिणी मुरली  तेरा  मुरलीधर।।94।।
नेति नेति कह कह श्रुति करती नित जिसका बखान मधुकर
रस पिपासु खोजता चिरंतन वही कृष्ण राधा निर्झर
इन्द्रिय वृन्द गोपिकायें है आत्मा ही  राधारानी
टेर रहा है रासपूर्णिमा  मुरली  तेरा   मुरलीधर।।95।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# कानून ताज़ीरात शौहर : भारतेन्दु हरिश्चन्द्र-3......(सच्चा शरणम )

08 September 2009

विनय की कविता (ऑडियो)

पाँच-छः वर्ष पहले हमारे कस्बे में हुए एक कवि-सम्मेलन, जो आकाशवाणी वाराणसी के तत्कालीन निदेशक श्री शिवमंगल सिंह ’मानव” की पुस्तक के विमोचन पर आयोजित था व जिसकी अध्यक्षता श्री चन्द्रशेखर मिश्र जी ने की थी, में बाबूजी द्वारा पढ़ी गयी भोजपुरी कविता की बमुश्किल रिकार्डेड ऑडियो फाइल प्रस्तुत है । इसमें बाबूजी ने जगतजननी के चरणों में अपना विनय प्रदर्शित किया है -




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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# रमणी के नर्म वाक्यों से खिल उठा मंदार (वृक्ष-दोहद....).... सच्चा शरणम

06 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 15

वह अनकहे स्नेह चितवन से उर में धँस जाता मधुकर
इस जीवन के महाकाव्य की सबसे सरस पंक्ति निर्झर
जन अंतर के रीते घट में भरता पल पल सुधा सलिल
टेर रहा है विभवभूषणा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।86।।
मरना उसके लिये उसी के हित ही हो जीना मधुकर
उसको ही ले तैर उसी को ले कर डूब यहाँ निर्झर
कंध देश पर रख तुमको परिरंभण में ले बचा बचा
टेर रहा सौभाग्यवर्धिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।87।।
अंगुलि से पोंछता कपोलों पर ढुलकते अश्रु मधुकर
निज अम्बर से ढंक देता सिहरता तुम्हारा तन निर्झर 
श्वांसों से भी अति समीप आ आलिंगन में बाँध तुम्हें
टेर रहा है भावविभोरा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।88।।
किसे पता कब डूब जाय यह कागज की नौका मधुकर
पहले उससे मिल ले पीछे जो इच्छा हो कर निर्झर
प्राण विहंगम विषम पींजरे में छटपटा रहा कब से
टेर रहा मुक्तअम्बरा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।89।।
बॅंध जाना बाँधना भली विधि उसने सीखा है मधुकर
हिला मृदुल दूर्वा दल अंगुलि बुला रहा पल पल निर्झर
पर्वत पर्वत शिखर शिखर पर गुंजित कर सस्वर वंशी
टेर रहा है स्नेहिलरागा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।90।।


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24 August 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 14

कोटि काम सुन्दर गुण मन्दिर कोटि कला नायक मधुकर
अपने हृदयेश्वर के आगे थिरक थिरक नाचो निर्झर
उर वृन्दावन चारी को मन दे उनके मन वाला बन
टेर रहा गठबंधनोत्सुका मुरली तेरा मुरलीधर।।81।।

पतिव्रतरता कीर्ति वनिता पुंश्चली नहीं प्रमदा मधुकर
एक मात्र सच्चे प्रभु का ही उसने किया वरण निर्झर
उसकी आशा छोड़ ललक कर जीवन धन का आलिंगन
टेर रहा पुरुषोत्तमाश्रया मुरली तेरा मुरलीधर।।82।।

आँख बिछा दे इसी मार्ग से आने वाला है मधुकर
छलक छलक फिर फिर भरने दे व्याकुल विरह नयन निर्झर
वह आँखों में आँख डालकर रस धाराधर मंद हसन
टेर रहा है स्नेहस्निग्धिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।83।।

सच्चे में सब भाॅंति समाहित सदा तुम्हारा हित मधुकर
डूब उसी में वहीं तरंगित अद्भुत मोहन रस निर्झर
मत तट पर रुक बह धारा में उसकी लहरों बीच बिछल
टेर रहा अंतस्तरंगिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।84।।

जीवन जीर्ण तरी सागर में हिचकोले खाती मधुकर
बिन पतवार न कोई खेवनहार अथाह प्रलय निर्झर
विषम काल में परम हितैशी सच्चा दुख दारिद्र्य दमन
टेर रहा है कल्पविटपिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।85।।

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22 August 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 13

बस अपने ही लिये रचा है तुमको प्रियतम ने मधुकर
अन्य रचित उसकी चीजों पर क्यों मोहित होता निर्झर
श्वांस श्वांस में बसा तुम्हारे रख अपना विश्वास अचल
टेर रहा है संततलब्धा मुरली तेरा मुरलीधर।।76।।

जीने की वासना न रख मत मरने की वांछा मधुकर
मात्र प्रतीक्षा में बैठा रह कब कैसी आज्ञा निर्झर
सोच जगत को बना जगत का उसको सोच उसी का बन
टेर रहा है चिंतनाश्रया मुरली तेरा मुरलीधर।।77।।

वैसे ही रह जग में जैसे रसना रहती है मधुकर
लाख भले घृत चख ले होती किन्तु न स्निग्ध कभीं निर्झर
इनसे उनसे तोड़ उसी से पंकिल नाता जोड़ सखे
टेर रहा भक्तानुकंपिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।78।।

कुटिल रीछनी यथा गुदगुदा करती प्राण हरण मधुकर
ललचा ललचा तथा मारती विषय वासनायें निर्झर
जग के कच्चे कूप कूल पर सम्हल सम्हल के बढ़ा चरण
टेर रहा है भ्रमोत्पाटिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।79।।

मत अशान्त हो विलख न सोया है सच्चा प्रियतम मधुकर
दुख की श्यामल जलद घटा से ही झरता सुख का निर्झर
सुख उसका मुख चन्द्र कष्ट है उसकी कुंचित कच माला
टेर रहा है सर्वकामदा मुरली तेरा मुरलीधर।।80।।

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06 August 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 12

नहीं भागते हुए जलद के संग भागता नभ मधुकर
चलते तन के संग न चलता कभीं मनस्वी मन निर्झर
किससे क्या लेना देना तेरा तो सच्चा से नाता
टेर रहा अपनत्ववर्षिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।71।।

प्रेम भरे लोचन प्रियतम के हित ही खोल रसिक मधुकर
और कहाँ रस रसाभास का बहता व्यभिचारी निर्झर
विश्व वाटिका के माली को दे दे अपने प्राण सुमन
टेर रहा प्रबलपिपासा मुरली तेरा मुरलीधर।।72।।

विरह ताप से प्राणनाथ के तू न कभीं तड़पा मधुकर
क्षुधित तृषित ज्यों वारि असन हित फिरता विकल व्यथित निर्झर
रे कर दे पाताल गगन को एक कृष्ण प्रेमी पगले
टेर रहा पुरुषार्थरुपिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।73।।

तेरा चिंतन ही है तेरे प्राणों का दर्पण मधुकर
उससे कहाँ छिपाना जिसने देखा सारा तन निर्झर
अंतर्मुख हो बैठ पास में उसके मृदुल पलोट चरण
टेर रहा है हृदयवल्लभा मुरली तेरा मुरलीधर।।74।।

मनतरंग निग्रह में बहता है आनन्द परम मधुकर
यह अनुभव होते ही क्षण में होता मन नीरस निर्झर
प्रभु चिन्तन ही विधि जग चिन्तन है निषेधमय पथ पंकिल
टेर रहा है विधिविधायिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।75।।

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19 July 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 11

अगणित जन्मों की ले दारुण कर्मश्रृंखलायें मधुकर
जब जो भी दीखता उसी से व्याकुल पूछ रहा निर्झर
उसका कौन पता बतलाये नाम रुप गति अकथ कथा
टेर रहा करुणासाध्या मुरली तेरा मुरलीधर।।66।।

क्या कण कण वासी अनन्त का अन्वेषण संभव मधुकर
स्वयं भावना समझ करुण वह पास उतर आता निर्झर
चन्द्र दिवाकर स्वयं कृपाकर करते ज्योर्तिमय त्रिभुवन
टेर रहा स्वजनांकमालिका मुरली तेरा मुरलीधर।।67।।

तृशित चंचु चातक तुम सच्चा स्वाति मेघ माला मधुकर
तुम पतझर पूरित कानन वह प्रियतम वासंती निर्झर
तुम चकोर वह चंद्र मयूरी तुम वह श्रावण जलज सजल
टेर रहा अंतराकर्षिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।68।।

रोता गगन बिलखती धरती दहक रहा पावक मधुकर
उबल रहा पाथोधि प्रकम्पित मारुत का अंतर निर्झर
उद्वेलित वन खग पुकारते वह सच्चा प्राणेश कहाँ
टेर रहा है पीरप्रणयिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।69।।

प्रभु तुमको जानते अपर फिर जाने मत जाने मधुकर
तेरा सच्चा से परिचय फिर मिले न मिले अपर निर्झर
उस हृदयस्थ परम प्रियतम की चरण शरण ही कल्याणी
टेर रहा करुणापयोधरा मुरली तेरा मुरलीधर।।70।।



09 July 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 10

आह्लादित अंतर वसुंधरा दृग मोती ले ले मधुकर
भावतंतु में गूंथ हृदय की मधुर सुमन माला निर्झर
पिन्हा ग्रीव में आत्मसमर्पण कर होती कृतार्थ धरणी
टेर रहा सर्वस्वस्वीकृता मुरली तेरा मुरलीधर।।61।।

अगरु धूम से उड़े जा रहे अम्बर में जलधर मधुकर
सुर धनु की पहना देते उसको चपला माला निर्झर
नीर बरस कर अघ्र्य आरती करती घन विद्युत माला
टेर रहा मधुरामनुहारा मुरली तेरा मुरलीधर।।62।।

तुच्छ न कह ठुकराना वाला वह तेरा अर्पण मधुकर
लघु पद सरिता को भी उर में भरता विशद सिंधु निर्झर
लतिकाओं की वेदी में खेला करते लघु ललित सुमन
टेर रहा प्रतिकणक्शणपर्वा मुरली तेरा मुरलीधर।।63।।

जड़ पारसमणि छू लोहा भी कुंदन हो जाता मधुकर
प्राणनाथ सच्चा प्रियतम तो परम चेतना का निर्झर
स्नेहमयी ममता से तुमको सटा हृदय से हृदयेश्वर
टेर रहा परिवर्तनप्राणा मुरली तेरा मुरलीधर।।64।।

भले चपल अलि कुटिल कलुशमय पर उसका ही तू मधुकर
सभी निर्धनों का धन वह सब असहायों का बल निर्झर
लांछित होकर भी न हिरण को कभीं त्याग देता हिमकर
टेर रहा स्वजनाश्रयशीला मुरली तेरा मुरलीधर।।65।।


05 July 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 9

किससे मिलनातुर निशि वासर व्याकुल दौड़ रहा मधुकर
सच्चे प्रभु के लिये न तड़पा बहा न नयनों से निर्झर
व्यर्थ बहुत भटका उनके हित अब दिनरात बिलख पगले
टेर रहा है अश्रुमालिनी   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।56।।

सूर्यकान्तमणि सुभग सजाकर अम्बर थाली में मधुकर
उषा सुन्दरी अरुण आरती करती उसकी नित निर्झर
सिन्दूरी नभ से मुस्काता वह सच्चा सुषमाशाली
टेर रहा है किरणमालिनि मुरली   तेरा  मुरलीधर।।57।।

उडुगण मेचक मोर पंख का गगन व्यजन ले कर मधुकर
झलता पवन विभोरा रजनी पद पखारती रस निर्झर
तारकगण की दीप मालिका सजा मनाती दीवाली
टेर रहा ब्रह्माण्डवंदिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।58।।

उडुमोदक विधु दुग्ध कटोरा व्योम पात्र में भर मधुकर
सच्चे प्रिय को भोग लगाती मुदित यामिनी नित निर्झर
किरण तन्तु में गूंथ पिन्हाता हिमकर तारकमणिमाला
टेर रहा संसृतिमहोत्सवा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।59।।

सरित नीर सीकर शीतल ले सरसिज सुमन सुरभि मधुकर
करता व्यजन विविध विधि मंथर मलय प्रभंजन मधु निर्झर
सलिल सुधाकण अर्घ्य चढ़ाता उमग उमग कर रत्नाकर
टेर रहा आनन्दउर्मिला   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।60।।

24 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 8

संश्लेशित जीवन मधुवन को खंड खंड मत कर मधुकर
मधुप दृष्टि ही सृष्टि तुम्हारी वह मरुभूमि वही निर्झर
तुम्हें निहार रहा स्नेहिल दृग सर्व सर्वगत नट नागर
टेर रहा आनन्दतरंगा मुरली तेरा मुरलीधर।।51।।

साध न कुछ बस साध यही साधना साध्य सच्चा मधुकर
यह सच्ची चेतना उतर बन जाती है जागृति निर्झर
वह है ही बस वह ही तो है अलि यह प्रेम समाधि भली
टेर रहा अमितानुरागिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।52।।

कोटि कला कर भी निज छाया पकड़ न पायेगा मधुकर
सच्चे पद में ही मिट पातीं सब काया छाया निर्झर
फंस संकल्प विकल्पों में क्यों झेल रहा संसृति पीड़ा
टेर रहा है निर्विकल्पिका मुरली तेरा मुरलीधर।।53।।

गिरि श्रृंगों को तोड़ फोड़ कर भूमि गर्भ मंथन मधुकर
सूर्य चन्द्र तक पहुंच चीर कर नभ में मेघ पटल निर्झर
उषा निशा सब दिशाकाल में मतवाला बन ढूँढ़ उसे
टेर रहा है प्राणप्रमथिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।54।।

विषय अनल में जाने कब से दग्ध हो रहा तू मधुकर
कृष्ण प्रेम आनन्द सुधामय परम रम्य शीतल निर्झर
उसे भूल जग मरुथल में सुख चैन खोजने चले कहाँ
टेर रहा शाश्वतसुखाश्रया मुरली तेरा मुरलीधर।।55।।

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20 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 7

जाग न जाने कब वह आकर खटका देगा पट मधुकर
सतत सजगता से ही निर्जल होता अहमिति का निर्झर
मूढ़ विस्मरण में निद्रा में मिलन यामिनी दे न बिता
टेर रहा विस्मरणविनाशा मुरली तेरा मुरलीधर।।46।।

क्या स्वाधीन कभीं रह सकता क्षुद्र भोग भोगी मधुकर
क्षणभंगुर वासना बीच बहता न प्रीति का रस निर्झर
भरा भरा भटकता बावरे रिक्त न निज को किया कभीं
टेर रहा रिक्तान्तरालया मुरली तेरा मुरलीधर।।47।।

बड़भागी हो सुन सच्चे का कितना प्यारा स्वर मधुकर
जाते जहाँ वहीं बह जाता गुनगुन गीतों का निर्झर
और मिले कुछ मिले न जग में बस अक्षय धन कृष्ण स्मरण
टेर रहा प्रभुसम्पदालया मुरली तेरा मुरलीधर।।48।।

अहोभाग्य तुमको ज्योतिर्मय करता है दिनमणि मधुकर
नहलाता मनहर रजनी में उसका राकापति निर्झर
धन्य धन्य तुमको प्रियतम का दुलराता तारा मंडल
टेर रहा है विश्वंभरिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।49।।

सुमनों की मधु सुरभि धार में तुम्हें बुलाता वह मधुकर
वासंती किसलय में तेरे लिये लहरता रस निर्झर
कली कली प्रति गली गली में रहा पुकार गंधमादन
टेर रहा है सर्वमूर्तिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।50।।


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17 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 6

सोच अरे बावरे कर्म से ही तो बना जगत मधुकर
चल उसके संग रच एकाकी एक प्रीति पंकिल निर्झर
प्राण कदंब छाँव में कोमल भाव सुमन की सेज बिछा
टेर रहा सुखसृष्टिविधाना मुरली तेरा मुरलीधर।।41।।

रख निश्शब्द स्नेह से उसके आनन पर आनन मधुकर
भर ले रिक्त हृदय की गागर उमड़ा सच्चा रस निर्झर
प्राणों से प्राणों का पंकिल चलने दे संवाद सरस
टेर रहा है संवादसर्जिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।42।।

सुमन सुमन प्रति कलिका कलिका मँडराता फिरता मधुकर
क्षुधा पिपासा मिटी न युग से भटक रहा है तू निर्झर
तू मन का मन नहीं तुम्हारा खंड खंड में फंसा चपल
टेर रहा है क्लेशनाशिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।43।।

फेरा तेरा जन्म जन्म का मिटा नहीं लम्पट मधुकर
अभीं और कितना भटकेगा इस निर्झर से उस निर्झर
बहिर्मुखी गुंजन से तेरी भग्न हुई जीवन वीणा
टेर रहा है प्राणगुंजिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।44।।

किया न अवलोकन अंतर्मुख मौन शान्त मानस मधुकर
शान्त चित्त में ही विलीन हो पाता अहंकार निर्झर
सुन विचार शून्यता बीच निज प्रियतम की पदचाप मधुर
टेर रहा है शांतिसागरा मुरली तेरा मुरलीधर।।45।।


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15 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 5

प्राणेश्वर के संग संग ही कुंज कुंज वन वन मधुकर
डोल डोल हरि रंग घोल अनमोल बना ले मन निर्झर
शेश सभी मूर्तियाँ त्याग सच्चे प्रियतम के पकड़ चरण
टेर रहा है सर्वशोभना मुरली तेरा मुरलीधर।।36।।

छवि सौन्दर्य सुहृदता सुख का सदन वही सच्चा मधुकर
कर्म भोग दुख स्वयं झेल लो हों न व्यथित प्रियतम निर्झर
तुम आनन्द विभोर करो नित प्रभु सुख सरि में अवगाहन
टेर रहा है प्राणपोषिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।37।।

ललित प्राणवल्लभ की कोमल गोद मोदप्रद है मधुकर
प्रियतम की मृणाल बाँहें ही सुख सौभाग्य सेज निर्झर
प्रेम अवनि वह पवन प्रेम जल प्रेम वह्नि गिरि नभ सागर
टेर रहा है प्रेमाकारा मुरली तेरा मुरलीधर।।38।।

डूब कृष्ण स्मृति रस में मानस मधुर कृष्णमय कर मधुकर
बहने दे उर कृष्ण अवनि पर कल कल कृष्ण कृष्ण निर्झर
सब उसका ही असन आभरण शयन जागरण हास रुदन
टेर रहा है सर्वातिचेतना मुरली तेरा मुरलीधर।।39।।

हृदय कुंज में परम प्रेममय निर्मित अम्बर मधुकर
उसी परिधि में विहर तरंगित सर्वशिरोमणि रस निर्झर
इस अम्बर से भी विशाल वह प्रेमाम्बर देने वाला
टेर रहा है विश्ववंदिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।40।।
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14 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 4

श्वाँस श्वाँस में रमा वही सब हलन चलन तेरी मधुकर
यश अपयश उत्थान पतन सब उस सच्चे रस का निर्झर
वही प्रेरणा क्षमता ममता प्रीति पुलक उल्लास वही
टेर रहा है व्यक्ताव्यक्ता मुरली तेरा मुरलीधर।।31।।

कर्णफूल दृग द्युति वह तेरी सिंदूरी रेखा मधुकर
वही हृदय माला प्राणों की वीणा की झंकृति निर्झर
वही सत्य का सत्य तुम्हारे जीवन का भी वह जीवन
टेर रहा है परमानन्दा मुरली तेरा मुरलीधर ।। 32।।

रह लटपट उसको पलकों की ओट होने दे मधुकर
मिलन गीत गाता लहराता बहा जा रहा रस निर्झर
तुम उसकी हो प्राणप्रिया परमातिपरम सौभाग्य यही
टेर रहा है हृदयोल्लासिनि मुरली तेरा मुरलीधर।।33।।

मृदुल मृणाल भाव अंगुलि से छू मन प्राण बोध मधुकर
रोम रोम में लहरा देता वह अचिंत्य लीला निर्झर
मधुराधर स्वर सुना विहॅंसता वह प्रसन्न मुख वनमाली
टेर रहा है सर्वमंगला मुरली तेरा मुरलीधर।।34।।

नारकीय योनियाँ अनेकों रौरव नर्क पीर मधुकर
उसके संग संग ले सह ले सब उसका लीला निर्झर
रहना कहीं बनाये रखना उसको आँखों का अंजन
टेर रहा है सर्वशिखरिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।35।।
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मुरली तेरा मुरलीधर 3

सो कर नहीं बिता वासर दिन रात जागता रह मधुकर
जो सोता वह खो देता है मरुथल में जीवन निर्झर
सर्वसमर्पित कर इस क्षण ही साहस कर मिट जा मिट जा
टेर रहा सर्वार्तिभंजिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।21।।

सोच रहा क्या देख देख कितना प्यारा मनहर मधुकर
मात्र टकटकी बाँध देखते उमड़ पड़ेगा रस निर्झर
जीवन के प्रति रागरंग का तुम्हें सुना संगीत ललित
टेर रहा है मंजुमोहिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।22।।

देख रहा जो उसे देखने का संयोग बना मधुकर
दिशा शून्य चेतना खोज ले रासविहारी रस निर्झर
पर से निज पर ही निज दृग की फेर चपल चंचल पुतली
टेर रहा स्वात्मानुसंधिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।23।।

तेरे अधरों का गुंजन वह गीत वही स्वर वह मधुकर
उसे निहार निहाल बना ले पंकिल नयनों का निर्झर
थक थक बैठ गया तू फिर भी भेंज रहा वह संदेशा
टेर रहा है शतावर्तिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।24।।

अपने मन में ही प्रविष्ट नित कर ले उसका मन मधुकर
बस उसके मन का ही रसमय झर झर झरने दे निर्झर
जग प्रपंच को छीन तुम्हारा मन कर देगा बरसाना
टेर रहा है उरनिकुंजिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।25।।

सबसे सकता भाग स्वयं से भाग कहाँ सकता मधुकर
भाग भाग कर रीता ही रीता रह जायेगा निर्झर
कुछ होने कुछ पा जाने की आशा में बॅंध मर न विकल
टेर रहा स्वात्मानुशिलिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।26।।

यदि तोड़ना मूढ़ कुछ है तो तोड़ स्वमूर्च्छा ही मधुकर
जड़ताओं के तृण तरु दल से रुद्ध प्राण जीवन निर्झर
शुचि जागरण सुमन परिमल से सुरभित कर जीवन पंकिल
टेर रहा है पूर्णानन्दा मुरली तेरा मुरलीधर।।27।।

क्या ‘मैं’ के अतिरिक्त उसे तूँ अर्पित कर सकता मधुकर
शेष तुम्हारे पास छोड़ने को क्या बचा विषय निर्झर
‘मैं’ का केन्द्र बचा कर पंकिल कुछ देना भी क्या देना
टेर रहा अहिअहंमर्दिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।28।।

किसे मिटाने चला स्वयं का ‘मैं’ ही मार मलिन मधुकर
एकाकार तुम्हारा उसका फिर हो जायेगा निर्झर
शब्द शून्यता में सुन कैसी मधुर बज रही है वंशी
टेर रहा विक्षेपनिरस्ता मुरली तेरा मुरलीधर।।29।।

क्षुधा पिपासा व्याधि व्यथा विभुता विपन्नता में मधुकर
स्पर्श कर रहा वही परमप्रिय सच्चा विविध वर्ण निर्झर
वही वही संकल्पधनी है सतरंगी झलमल झलमल
टेर रहा है सर्वगोचरा मुरली तेरा मुरलीधर।।30।।

05 April 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 2

मंदस्मित करुणा रसवर्षी वह अद्भुत बादल मधुकर
मृदु करतल सहला सहला सिर हरता प्राण व्यथा निर्झर
मनोहारिणी चितवन से सर्वस्व तुम्हारा हर मनहर
टेर रहा है उरविहारिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।11।।

विविध भाव सुमनों की अपनी सजने दे क्यारी मधुकर
कोना कोना सराबोर कर बहे वहाँ सच्चा निर्झर
वह तेरे सारे सुमनों का रसग्राही आनन्दपथी
टेर रहा सर्वांतरात्मिका मुरली तेरा मुरलीधर।।12।।


मॅंडराते आनन पर तेरे उसके कंज नयन मधुकर
तृषित चकोरी सदृश देख तू उसका मुख मयंक निर्झर
युगल करतलों में रख आनन कर निहाल तुमको अविकल
टेर रहा है मन्मथमथिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।13।।

सब प्रकार मेरे मेरे हो गदगद उर कह कह मधुकर
युग युग से प्यासे प्राणों में देता ढाल सुधा निर्झर
भरिता कर देता रिक्ता को बिना दिये तुमको अवसर
टेर रहा है नादविग्रहा मुरली तेरा मुरलीधर।।14।।

माँग माँग फैला कर अंचल बिलख विधाता से मधुकर
लहरा दे कुरुप जीवन में वह अभिनव सुषमा निर्झर
उसकी लीला वही जानता ढरकाता रस की गगरी
टेर रहा है प्रेमभिक्षुणि मुरली तेरा मुरलीधर।।15।।

गहन तिमिर में दिशादर्शिका हो ज्यों दीपशिखा मधुकर
मरु अवनी की प्राण पिपासा हर लें ज्यों नीरद निर्झर
तथा मृतक काया में पंकिल भर नव श्वाँसों का स्पंदन
टेर रहा है नित्य नूतना मुरली तेरा मुरलीधर।।16।।

लघु जलकणिका को बाहों के पलने में ले ले मधुकर
हलराता दुलराता रहता ज्यों अविराम सिंधु निर्झर
बिन्दु बिन्दु में प्रतिपल स्पंदित तथा तुम्हारा रत्नाकर
टेर रहा है स्वजनादरिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।17।।

चिन्तित सोच विगत वासर क्यों व्यथित सोच भावी मधुकर
प्रवहित निशि वासर अनुप्राणित नित्य नवल जीवन निर्झर
पल पल जीवन रसास्वाद का तुम्हें भेंज कर आमंत्रण
टेर रहा है प्रियागुणाढ्या मुरली तेरा मुरलीधर।।18।।

गत स्मृतियों को जोड जोड क्यों दौड रहा मोहित मधुकर
सुधा नीरनिधि छोड बावरे मरता चाट गरल निर्झर
फंस किस आशा अभिलाषा में व्यर्थ काटता दिन पंकिल
टेर रहा है मधुरमाधवी मुरली तेरा मुरलीधर।।19।।

गूँथ प्राणमाला मतवाला आनेवाला है मधुकर
अति समीप आसीन तुम्हारे ही तो तेरा रस निर्झर
बड़भागिनी तुम्हें कर देगा ललित अंक ले वनमाली
टेर रहा है मनोहारिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।20।।

12 March 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 1

विरम विषम संसृति सुषमा में मलिन न कर मानस मधुकर,
वहां स्रवित संतत रसगर्भी सच्चा श्री शोभा निर्झर !
सुन्दरता सरसता स्रोत बस कल्लोलिनी कुलानन्दी
टेर रहा वृन्दावनेश्वरी मुरली तेरा मुरलीधर !! 1 !!

वर्ण वर्ण खग कलरव स्वर में बोल रहा है वह मधुकर
विटप वृंत मरमर सरि कलकल बीच उसी का स्वर निर्झर
उर अंबर में बोध प्रभा का उगा वही दिनमान प्रखर
टेर रहा है विश्वानंदा मुरली तेरा मुरलीधर ।।2।।

संसृति सब सच्चे प्रियतम की उससे भाग नहीं मधुकर
उसमें जागृति का ही प्रेमी बन जा अनुरागी निर्झर
जो जग में जागरण सजाये वही मुकुन्द कृपा भाजन
टेर रहा संज्ञानसंधिनी मुरली तेरा मुरलीधर ।।3।।

जिस क्षण जग में हुए सर्वथा तुम असहाय अबल मधुकर
उस क्षण से ही क्षीर पिलाने लगती कृष्ण धेनु निर्झर
अपना किये न कुछ होना है सूत्रधार वह प्राणेश्वर
टेर रहा अबलावलंबिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।4।।

छोटी से छोटी भेंटें भी प्रिय की ही पुकार मधुकर
मुदित मग्न मन नाच बावरे पाया प्रिय दुलार निर्झर
कहां पात्रता थी तेरी यह तो उसकी ही महाकृपा
टेर रहा अप्रतिमकृपालुनि मुरली तेरा मुरलीधर।।5।।

नाम रूप पद बोध विसर्जित कर सच्चामय बन मधुकर
मनोराज्य में ही रम सुखमय झर झर झर झरता निर्झर
सच्चे प्रियतम के कर में रख पंकिल प्राणों की वीणा
टेर रहा अमन्दगुंजरिता मुरली तेरा मुरलीधर।।6।।

यत्किंचित जो भी तेरा है उसका ही कर दे मधुकर
करता रहे तुम्हें नित सिंचित प्रभुपद कंज विमल निर्झर
मलिन मोह आवरण भग्न कर करले प्रेम भरित अंतर
टेर रहा हे भुवनमोहिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।7।।

मनोराज्य में देख पुश्पिता उसकी तरुलतिका मधुकर
उसकी मनहर भावभरी भ्रमरी तितली सरणी निर्झर
स्नेह सुरभि बांटता सलोना मनभावन बंशीवाला
टेर रहा है अमृतसंश्रया मुरली तेरा मुरलीधर।।8।।

तुम्हें पुकार मधुर वाणी में बार बार मोहन मधुकर
कर्णपुटों में ढाल रहा है वह आनन्दामृत निर्झर
कहां गया संबोधनकर्ता विकल प्राण कर अन्वेषण
टेर रहा है आत्मविग्रहा मुरली तेरा मुरलीधर।।9।।

रंग रंग की राग रागिनी छेड बांसुरी में मधुकर
बूंद बूंद में उतर प्रीति का सिंधु बन गया रस निर्झर
तुम्हें बहुत चाहता तुम्हारा वह प्यारा सच्चा प्रियतम
टेर रहा सरसारसवंती मुरली तेरा मुरलीधर।।10।।

28 February 2009

सुलतान

नृप बनने के बाद जनों ने पूछा यही हसन से बात      ।

पास न सेना विभव बहुत, कैसे सुलतान हुए तुम तात    ।

बोला अरि पर भी उदारता सच्चा स्नेह सुहृद हित प्राप्त   ।

जन-जन प्रति सदभाव न क्या सुलतान हेतु इतना पर्याप्त ।

11 February 2009

आशा है स्नेह बनाए रखेंगे

'बावरिया बरसाने वाली' के अभी सैकड़ों छंद यहाँ नहीं आए हैं। इस ब्लॉग की प्रविष्टियों को पढ़कर सम्मानित गजलकार 'द्विजेन्द्र द्विज जी' ने इनमें रूचि दिखाई। बाद में उनकी प्रेरणा से पिता जी की यह काव्य रचना पूर्णतः 'कविता कोष' में सम्मिलित करने के लिए स्वीकृत हो गई और अब वहाँ संपूर्णतः उपलब्ध है । अतः अब इस रचना की प्रविष्टियां यहीं रोककर पिताजी की अन्य रचनाएँ यहाँ प्रस्तुत करूंगा। उनमें कुछ अनुवाद भी हैं जो पिता जी ने संस्कृत,अंग्रेजी आदि भाषा की रचनाओं के किए हैं । गुरुदेव 'टैगोर' की 'गीतांजलि' के अनुवाद मैं पहले ही अपने चिट्ठे सच्चा शरणम् पर प्रस्तुत कर चुका हूँ। आशा है स्नेह बनाए रखेंगे। सच्चा शरणम पर प्रस्तुत गीतांजलि के अनुवादों की सभी प्रविष्टियाँ यहाँ देखी जा सकती हैं -

गीतांजलि के काव्यानुवाद


31 January 2009

बावरिया बरसाने वाली 20

कहते थे हे प्रिय! “स्खलित-अम्बरा मुग्ध-यौवना की जय हो ।
अँगूरी चिबुक प्रशस्त भाल दृग अरूणिम अधर हास्यमय हो ।
वह गीत व्यर्थ जिसमें बहती अप्सरालोक की बात न हो ।
परिरंभण-पाश-बॅंधी तरूणी का धूमिल मुख जलजात न हो।
कहता हो प्रचुर प्रेम-सन्देशा विद्युत विलसित जलद चपल।
उठता हो केलि-विलास-दीप्त उद्दाम कामना-कोलाहल।
क्या वीतराग हो गये विकल” बावरिया बरसाने वाली।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥52॥


सुधि करो प्राण! वह भी कैसी मनहरिणी निशा अनूठी थी।
सारी यामिनी विलग तुमसे प्रिय मान किये मैं रूठी थी।
गलदश्रु मनाते रहे चरण-छू छोड़ो सजनी नहीं-नहीं।
तेरा नखशिख श्रृँगार करूँ इस रजनी में कामना यही।
रक्ताभ रंग से रचूँ प्राण ! सित पद-नख में राकेश-कला।
आलता चरण की चूम बजे नूपुर-वीणा घुँघरू-तबला।
दुलराने वाले ! आ विकला बावरिया बरसाने वाली।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥53॥

“पिंडलि पर आँकू”, कहा श्याम “लतिका दल में खद्योत लिये।
नव कदलि-खम्भ मृदु पीन-जघन पर पुष्पराग दूँ पोत प्रिये!
विरॅंचू नितम्ब पर नवल नागरी व्रजवनिता बेचती दही।
पदपृष्ठप्रान्त में अलि-शुक-मैना मीन-कंज-ध्वज-शंख कही्।
फिर बार-बार बाँधू केहरि-कटि पर परिधान नवल धानी।
अन्तर्पट पर रच दूँ लिपटी केशव-कर में राधा रानी।”
हो चतुर चितेरे! कहाँ, विकल बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥54॥

था कहा ”पयोधर पर कर मेरे नील-झीन-कञ्चुकी धरें।
बाँधे श्लथ-बन्धन-ग्रंथि सुभग कुच अर्ध छिपे आधे उभरे।
रच दूँ पयोधरों के अन्तर में हरित-कमल-कोमल डंठल।
रक्ताभ चंचु में थाम उसे युग थिरकें बाल मराल धवल।
आवरण-विहीन उदर-त्रिबली में झलके भागीरथी बही।
हीरक-माला में गुँथी मूर्ति हो प्रथम-मिलन-निशि की दुलही।।“
ओ मनुहारक! आ जा विकला बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥55॥

28 January 2009

बावरिया बरसाने वाली १९

सुधि करो कहा था,"कभीं निभृत में सजनी! तेरा घूँघट-पट।
निज सिर पर सरका लूँ फ़िर चूमूँ नत-दृग अधर-सुधा लटपट।
छेड़ना करुण पद कुपित कोकिला रात-रात भर सो न सके ।
अलकों का गहन तिमिर बिखराना विरह-सवेरा हो न सके ।
रूठना पुनः अवगुण्ठन से मनुहार निहार उमड़ पड़ना ।
तुम इन्द्रधनुष-सी विनत, अधर झुक मेरे अधरों पर धरना।"
मनुहार-विशारद! आ, विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥48॥

प्रिय! झुका कदम्ब-विटप-शाखा तुम स्थित थे कालिन्दी-तट पर।
विह्वल सुनते थे लहरों का स्नेहिल कल-कल-कल छल-छल स्वर।
टप-टप झरते थे सलिल-बिन्दु थे सरसिज-नयन खुले आधा ।
भावाभिभोर हो विलख-विलख कह उठते थे राधा-राधा ।
थी मुदित प्रकृति, उत्सवरत थी नीचे वसुन्धरा,ऊपर नभ ।
खोये थे जाने कहाँ, पास ही थी मैं खड़ी प्राणवल्लभ !
उद्गार तुम्हारा सुन लिपटी बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥49॥

सुधि करो कहा था, "प्रेम-पर्व पर पंकिल उल्कापात न हो ।
जो प्रेयसि-परिरंभण-विहीन वह रात न हो, वह प्रात न हो ।
परिमल-प्रसून ले बहे पवन नित ज्योतित करे अवनि हिमकर।
लहरे पयोधि, प्रिय पिये सतत पियूष-प्रवाहित-प्रिया-अधर ।
नित धेनु-धूलि वेला में खेलें आँख मिचौनी दिन-रजनी ।
भ्रमरों के गुनगुन पर थिरके तितली प्रसून-संगिनी बनी ।"
उद्गारक! कहाँ छिपे विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥50॥

क्या नहीं कहा प्रिय! "मंजु-अँगुलियाँ खेलें प्रेयसि-अलकों में।
तारक-चुम्बित सित-तुहिन-बिन्दु झलकें वसुधा की पलकों में।
प्रातः समीर सुन्दरि-कपोल छू रोमांचित कर जाता हो ।
सागर निर्झरिणी को धरणी को इन्दु सप्रेम मनाता हो ।
सरसिज-संकुल-सर दिशा व्यर्थ जिसमें शुक-पिक-स्वर घात न हो।
देखूं न कभीं गिरि-शिखर जहाँ पर निर्झर-नीर-निपात न हो ?"
आ प्रेम-पुरोहित ढूँढ़ रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥51॥

22 January 2009

बावरिया बरसाने वाली 18

कहते थे प्राण "अरी, तन्वी! मैं कृष कटि पर हो रही विकल ।
कह रही करधनी ठुनक-ठुनक रो रहे समर्थन में पायल ।
भय है उरोज-परिवहन पवन से हो न क्षीण त्रिबली-भंजन ।
रोमांच पुलक-वलयिता कल्प-विटपिनी लता काया कंचन ।
जब किया अलक्तक-रस रंजित हो गये चरण बोझिल-विह्वल् ।
कुन्तल-सुगन्ध-भाराभिभूत किसलयी सेज से गयी बिछल ।"
प्रिय! इस स्नेहामृत की तृषिता बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥38॥

था कहा सुमन-मेखला-वहन से बढ़ती श्वांस समीर प्रबल ।
प्रश्वांस-सुरभि-पंकिल सरोज-मुख आ घेरते भ्रमर चंचल ।
प्राणेश्वरि सम्बोधन से ही खिल जाते गाल गुलाबी हैं ।
हो जाते तेरे नील जलद से तरलित दृग मायावी हैं ।
मधुकर-पक्षापघात-मारुत कर जाता भृकुटि-अधर-स्पंदन।
यह कह-कह रस बरसाने वाले छोड़ गये क्यों मनमोहन ।
कब विधु-मुख देखेगी विकला बावरिया बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥39॥

क्या कहूं आज ही विगत निशा के सपने में आये थे प्रिय !
तुम करते-करते सुरत प्रार्थना किंचित सकुचाये थे प्रिय !
मुझमें उड़ेल दी अपने चिर यौवन की अल्हड़ मादकता ।
दृग-तट पर दिया उतार हंस, थी पलकों पर गूंथी मुक्ता ।
अभिसार-सदन में दीपक की लौ उकसाया हौले-हौले ।
इतने भावाभिभूत थे प्रिय फ़िर अधर नहीं तेरे बोले ।
उस प्राणेश्वर को ढूंढ़ रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥40॥

निज इन्द्रनीलमणि-सा श्यामल कर में ले उत्तरीय-कोना ।
सहला मेरा शरदिन्दु भाल जाने क्या-क्या करते टोना ।
था गूंथ रहा नीलाम्बर में चन्द्रमा तारकों की माला ।
जाने क्या-क्या तुमने प्रियतम! मेरे कानों में कह डाला ।
आवरण-स्रस्त प्रज्ज्वलित अरुण किसलय समान कोमल काया।
मृदु पल्लव-दल-रमणीय-पाणि-तल से तुमने प्रिय! सहलाया।
जल-कढ़ी मीन-सी तड़प रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥41॥

अधरों पर चाहा हास किन्तु लोचन में उमड़ गया पानी ।
बहलाने लगी प्रेम की कह प्राचीन कहानी मृदुवाणी ।
इतने में ही वाटिका से कही प्रिय! विरही कोकिल कूका ।
मैं कह न सकूंगी क्यों निज आनन से मैनें दीपक फ़ूंका ।
लज्जित आनन पर अनायास ही श्यामकेशदल घिर आये।
तुम पीत पयोधर बीच विंहसते अपना आसन फ़ैलाये ।
प्रिय, अब भी वही तुम्हारी है , बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥42॥

सुधि करो प्राण! कहते गदगद "प्राणेश्वरि, तुम जीवनधन हो।
मुझ पंथ भ्रमित प्रणयी पंथी हित तुम चपला-भूषित घन हो।
तव अंचल की छाया में ही मेरी अभिलाषा सोती है ।
तव प्रणय-पयोधि-लहरियां ही मेरा मानस तट धोती हैं ।
तव मृदुल वक्ष पर ही मेरे लोचन का ढलता मोती है ।
तव कलित-कांति-कानन में ही मेरी चेतनता खोती है ।
अब सहा नहीं जाता विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥43॥

सुधि करो प्राण! कहते "मृदुले! तारुण्य न फ़िर फ़िर आता है।
वह धन्य सदा जो झूम झूम कर गीत प्रीति के गाता है ।
देखो, वसत के उषा-काल ने दिया शिशिर-परिधान हटा ।
मुकुलित रसाल टहनियाँ झूमतीं पुलक अंग में अंग सटा ।
देखो प्रेयसि! नभ के नीचे मारुत मकरंद लुटाता है ।
उन्मत्त नृत्य करता निर्झर गिरि-शिखरों से कह जाता है ।
चिर-तरुण, दर्शनोत्सुका विकल बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥44॥

था कहा "प्रिये! लहरते सुमन ज्यों फ़ेनिल-सरिता बरसाती ।
आनन्द-गीत गा रहा भ्रमर कुहुँकती कोकिला मदमाती ।
मेरे जीवन की चिर-संगिनि परिणय-पयोधि उफ़नाता है ।
आकाश उढ़ौना सुमन बिछौना तृण-दल पद सहलाता है ।
आओ हम अपने प्राणों को खग के कलरव में लहरा दें ।
द्रुत पियें अमर आसव वासंती मार पताका फ़हरा दें ।
तारुण्य-तरल ! है परम विकल बावरिया बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥45॥


था कहा विहँस "मृगनयनी! मेरा कर हथेलियों में ले लो ।
मृगमद से सुरभित करो पयोधर सरसिज कलिका से खेलो।
आओ रसाल-तरु के नीचे आदान-प्रदान करें चुम्बन ।
नीरव-निशीथ के परिरंभण में सुनें हृदय का मृदु-स्पंदन ।
गाओ गीतों के बिना निशा का स्वागत कब हो पाता है ।
आ लिपट जुड़ा लें तप्त प्राण यह वासर ढलता जाता है" ।
हो रसिक शिरोमणि! कहाँ विकल बावरिया बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥46॥

सुधि करो प्राण! कहते थे तुम,"बस प्राणप्रिये! इतना करना।
तेरी स्मृति में विस्मृत जाये संसृति का जीना-मरना ।
तेरी पीताभ कुसुम-काया मेरे कर-बंधन में झूले ।
तव मलय-पवन-प्रेरित दुकूल लहरा मेरा आनन छू ले ।
गूँथना चिकुर में निशिगंधा की नित तटकी अधखिली कली।
तेरी पायल की छूम्-छननन् ध्वनि ढोती फ़िरे हवा पगली ।"
खोजती निवेदक को विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥47॥