24 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 8

संश्लेशित जीवन मधुवन को खंड खंड मत कर मधुकर
मधुप दृष्टि ही सृष्टि तुम्हारी वह मरुभूमि वही निर्झर
तुम्हें निहार रहा स्नेहिल दृग सर्व सर्वगत नट नागर
टेर रहा आनन्दतरंगा मुरली तेरा मुरलीधर।।51।।

साध न कुछ बस साध यही साधना साध्य सच्चा मधुकर
यह सच्ची चेतना उतर बन जाती है जागृति निर्झर
वह है ही बस वह ही तो है अलि यह प्रेम समाधि भली
टेर रहा अमितानुरागिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।52।।

कोटि कला कर भी निज छाया पकड़ न पायेगा मधुकर
सच्चे पद में ही मिट पातीं सब काया छाया निर्झर
फंस संकल्प विकल्पों में क्यों झेल रहा संसृति पीड़ा
टेर रहा है निर्विकल्पिका मुरली तेरा मुरलीधर।।53।।

गिरि श्रृंगों को तोड़ फोड़ कर भूमि गर्भ मंथन मधुकर
सूर्य चन्द्र तक पहुंच चीर कर नभ में मेघ पटल निर्झर
उषा निशा सब दिशाकाल में मतवाला बन ढूँढ़ उसे
टेर रहा है प्राणप्रमथिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।54।।

विषय अनल में जाने कब से दग्ध हो रहा तू मधुकर
कृष्ण प्रेम आनन्द सुधामय परम रम्य शीतल निर्झर
उसे भूल जग मरुथल में सुख चैन खोजने चले कहाँ
टेर रहा शाश्वतसुखाश्रया मुरली तेरा मुरलीधर।।55।।

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20 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 7

जाग न जाने कब वह आकर खटका देगा पट मधुकर
सतत सजगता से ही निर्जल होता अहमिति का निर्झर
मूढ़ विस्मरण में निद्रा में मिलन यामिनी दे न बिता
टेर रहा विस्मरणविनाशा मुरली तेरा मुरलीधर।।46।।

क्या स्वाधीन कभीं रह सकता क्षुद्र भोग भोगी मधुकर
क्षणभंगुर वासना बीच बहता न प्रीति का रस निर्झर
भरा भरा भटकता बावरे रिक्त न निज को किया कभीं
टेर रहा रिक्तान्तरालया मुरली तेरा मुरलीधर।।47।।

बड़भागी हो सुन सच्चे का कितना प्यारा स्वर मधुकर
जाते जहाँ वहीं बह जाता गुनगुन गीतों का निर्झर
और मिले कुछ मिले न जग में बस अक्षय धन कृष्ण स्मरण
टेर रहा प्रभुसम्पदालया मुरली तेरा मुरलीधर।।48।।

अहोभाग्य तुमको ज्योतिर्मय करता है दिनमणि मधुकर
नहलाता मनहर रजनी में उसका राकापति निर्झर
धन्य धन्य तुमको प्रियतम का दुलराता तारा मंडल
टेर रहा है विश्वंभरिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।49।।

सुमनों की मधु सुरभि धार में तुम्हें बुलाता वह मधुकर
वासंती किसलय में तेरे लिये लहरता रस निर्झर
कली कली प्रति गली गली में रहा पुकार गंधमादन
टेर रहा है सर्वमूर्तिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।50।।


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17 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 6

सोच अरे बावरे कर्म से ही तो बना जगत मधुकर
चल उसके संग रच एकाकी एक प्रीति पंकिल निर्झर
प्राण कदंब छाँव में कोमल भाव सुमन की सेज बिछा
टेर रहा सुखसृष्टिविधाना मुरली तेरा मुरलीधर।।41।।

रख निश्शब्द स्नेह से उसके आनन पर आनन मधुकर
भर ले रिक्त हृदय की गागर उमड़ा सच्चा रस निर्झर
प्राणों से प्राणों का पंकिल चलने दे संवाद सरस
टेर रहा है संवादसर्जिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।42।।

सुमन सुमन प्रति कलिका कलिका मँडराता फिरता मधुकर
क्षुधा पिपासा मिटी न युग से भटक रहा है तू निर्झर
तू मन का मन नहीं तुम्हारा खंड खंड में फंसा चपल
टेर रहा है क्लेशनाशिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।43।।

फेरा तेरा जन्म जन्म का मिटा नहीं लम्पट मधुकर
अभीं और कितना भटकेगा इस निर्झर से उस निर्झर
बहिर्मुखी गुंजन से तेरी भग्न हुई जीवन वीणा
टेर रहा है प्राणगुंजिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।44।।

किया न अवलोकन अंतर्मुख मौन शान्त मानस मधुकर
शान्त चित्त में ही विलीन हो पाता अहंकार निर्झर
सुन विचार शून्यता बीच निज प्रियतम की पदचाप मधुर
टेर रहा है शांतिसागरा मुरली तेरा मुरलीधर।।45।।


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15 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 5

प्राणेश्वर के संग संग ही कुंज कुंज वन वन मधुकर
डोल डोल हरि रंग घोल अनमोल बना ले मन निर्झर
शेश सभी मूर्तियाँ त्याग सच्चे प्रियतम के पकड़ चरण
टेर रहा है सर्वशोभना मुरली तेरा मुरलीधर।।36।।

छवि सौन्दर्य सुहृदता सुख का सदन वही सच्चा मधुकर
कर्म भोग दुख स्वयं झेल लो हों न व्यथित प्रियतम निर्झर
तुम आनन्द विभोर करो नित प्रभु सुख सरि में अवगाहन
टेर रहा है प्राणपोषिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।37।।

ललित प्राणवल्लभ की कोमल गोद मोदप्रद है मधुकर
प्रियतम की मृणाल बाँहें ही सुख सौभाग्य सेज निर्झर
प्रेम अवनि वह पवन प्रेम जल प्रेम वह्नि गिरि नभ सागर
टेर रहा है प्रेमाकारा मुरली तेरा मुरलीधर।।38।।

डूब कृष्ण स्मृति रस में मानस मधुर कृष्णमय कर मधुकर
बहने दे उर कृष्ण अवनि पर कल कल कृष्ण कृष्ण निर्झर
सब उसका ही असन आभरण शयन जागरण हास रुदन
टेर रहा है सर्वातिचेतना मुरली तेरा मुरलीधर।।39।।

हृदय कुंज में परम प्रेममय निर्मित अम्बर मधुकर
उसी परिधि में विहर तरंगित सर्वशिरोमणि रस निर्झर
इस अम्बर से भी विशाल वह प्रेमाम्बर देने वाला
टेर रहा है विश्ववंदिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।40।।
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14 June 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 4

श्वाँस श्वाँस में रमा वही सब हलन चलन तेरी मधुकर
यश अपयश उत्थान पतन सब उस सच्चे रस का निर्झर
वही प्रेरणा क्षमता ममता प्रीति पुलक उल्लास वही
टेर रहा है व्यक्ताव्यक्ता मुरली तेरा मुरलीधर।।31।।

कर्णफूल दृग द्युति वह तेरी सिंदूरी रेखा मधुकर
वही हृदय माला प्राणों की वीणा की झंकृति निर्झर
वही सत्य का सत्य तुम्हारे जीवन का भी वह जीवन
टेर रहा है परमानन्दा मुरली तेरा मुरलीधर ।। 32।।

रह लटपट उसको पलकों की ओट होने दे मधुकर
मिलन गीत गाता लहराता बहा जा रहा रस निर्झर
तुम उसकी हो प्राणप्रिया परमातिपरम सौभाग्य यही
टेर रहा है हृदयोल्लासिनि मुरली तेरा मुरलीधर।।33।।

मृदुल मृणाल भाव अंगुलि से छू मन प्राण बोध मधुकर
रोम रोम में लहरा देता वह अचिंत्य लीला निर्झर
मधुराधर स्वर सुना विहॅंसता वह प्रसन्न मुख वनमाली
टेर रहा है सर्वमंगला मुरली तेरा मुरलीधर।।34।।

नारकीय योनियाँ अनेकों रौरव नर्क पीर मधुकर
उसके संग संग ले सह ले सब उसका लीला निर्झर
रहना कहीं बनाये रखना उसको आँखों का अंजन
टेर रहा है सर्वशिखरिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।35।।
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मुरली तेरा मुरलीधर 3

सो कर नहीं बिता वासर दिन रात जागता रह मधुकर
जो सोता वह खो देता है मरुथल में जीवन निर्झर
सर्वसमर्पित कर इस क्षण ही साहस कर मिट जा मिट जा
टेर रहा सर्वार्तिभंजिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।21।।

सोच रहा क्या देख देख कितना प्यारा मनहर मधुकर
मात्र टकटकी बाँध देखते उमड़ पड़ेगा रस निर्झर
जीवन के प्रति रागरंग का तुम्हें सुना संगीत ललित
टेर रहा है मंजुमोहिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।22।।

देख रहा जो उसे देखने का संयोग बना मधुकर
दिशा शून्य चेतना खोज ले रासविहारी रस निर्झर
पर से निज पर ही निज दृग की फेर चपल चंचल पुतली
टेर रहा स्वात्मानुसंधिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।23।।

तेरे अधरों का गुंजन वह गीत वही स्वर वह मधुकर
उसे निहार निहाल बना ले पंकिल नयनों का निर्झर
थक थक बैठ गया तू फिर भी भेंज रहा वह संदेशा
टेर रहा है शतावर्तिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।24।।

अपने मन में ही प्रविष्ट नित कर ले उसका मन मधुकर
बस उसके मन का ही रसमय झर झर झरने दे निर्झर
जग प्रपंच को छीन तुम्हारा मन कर देगा बरसाना
टेर रहा है उरनिकुंजिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।25।।

सबसे सकता भाग स्वयं से भाग कहाँ सकता मधुकर
भाग भाग कर रीता ही रीता रह जायेगा निर्झर
कुछ होने कुछ पा जाने की आशा में बॅंध मर न विकल
टेर रहा स्वात्मानुशिलिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।26।।

यदि तोड़ना मूढ़ कुछ है तो तोड़ स्वमूर्च्छा ही मधुकर
जड़ताओं के तृण तरु दल से रुद्ध प्राण जीवन निर्झर
शुचि जागरण सुमन परिमल से सुरभित कर जीवन पंकिल
टेर रहा है पूर्णानन्दा मुरली तेरा मुरलीधर।।27।।

क्या ‘मैं’ के अतिरिक्त उसे तूँ अर्पित कर सकता मधुकर
शेष तुम्हारे पास छोड़ने को क्या बचा विषय निर्झर
‘मैं’ का केन्द्र बचा कर पंकिल कुछ देना भी क्या देना
टेर रहा अहिअहंमर्दिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।28।।

किसे मिटाने चला स्वयं का ‘मैं’ ही मार मलिन मधुकर
एकाकार तुम्हारा उसका फिर हो जायेगा निर्झर
शब्द शून्यता में सुन कैसी मधुर बज रही है वंशी
टेर रहा विक्षेपनिरस्ता मुरली तेरा मुरलीधर।।29।।

क्षुधा पिपासा व्याधि व्यथा विभुता विपन्नता में मधुकर
स्पर्श कर रहा वही परमप्रिय सच्चा विविध वर्ण निर्झर
वही वही संकल्पधनी है सतरंगी झलमल झलमल
टेर रहा है सर्वगोचरा मुरली तेरा मुरलीधर।।30।।