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बावरिया बरसाने वाली (काव्य): 2

31. सुधि करो प्राण कहते थे तुम क्यों बात–बात में हंसती हो किस कलुषित कंचन को मेरे निज हास्य–निकष पर कसती हो तुम होड़ लगा…

बावरिया बरसाने वाली (काव्य): 1

1. व्रजमंडल नभ में उमड़-घुमड़ घिर आए आषाढ़ी बादल उग गया पुरंदर धनुष ध्वनित उड़ चले विहंगम दल के दल उन्मत्त मयूरी उठी थिरक श्यामली…