26 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 36

कोना कोना प्रियतम का जाना पहचाना है मधुकर
इठलाता अटपटा विविध विधि आ दुलरा जाता निर्झर
शब्द रूप रस स्पर्श गन्ध की मृदुला बाँहों में कस कस
टेर रहा है अनन्तआस्वादा मुरली तेरा मुरलीधर।।196।।

हिला हिला दूर्वादल अंगुलि बुला रहा तुमको मधुकर
पर्वत पर्वत शिखर शिखर पर टेर रहा सस्वर निर्झर
चपल जलद पाणि से भेंज भेंज कर संदेशा
टेर रहा है आनन्दपर्विणी मुरली  तेरा मुरलीधर।।197।।

विरही तेरे श्याम न आये कैसे जीवित है मधुकर
तन में ग्रीष्म नयन में पावस भर उर में बसन्त निर्झर
मुख हेमन्त शरद गण्डस्थल चल रोमावलि शिशिर बना
टेर रहा है ऋतुरसस्विनी मुरली तेरा  मुरलीधर।।198।।

उसके अधरों से सीखा सुमनों ने मुस्काना मधुकर
उसके अधरों से ही सीखा कोकिल ने गाना निर्झर
छलकाता रहता मयंक उसके अधरों का अमृत
टेर रहा अधरामृतवर्षिणी मुरली  तेरा  मुरलीधर।।199।।

बॅंध बॅध कर रुक रुक जाता वह लघु में भी विराट मधुकर
थकते कभीं न उसके गाते अधर मिलन के स्वर निर्झर
मुँदी पलक में भी  वह नटखट आ रच लेता है शय्या
टेर रहा है स्वजनकंचुकी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।200।।

------------------------------------------------------------

अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# पराजितों का उत्सव : एक आदिम सन्दर्भ - ३ (सच्चा शरणम)

24 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 35

चिर विछोह की अंतहीन तिमिरावृत रजनी में मधुकर,
फिरा बहुत बावरे अभीं भी अंतर्मंथन कर निर्झर
सुन रुनझुन जागृति का नूपुर खनकाता वह महापुरुष
टेर रहा है अनहदनादा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।191।।

पी उसकी स्मिति सुधा प्रफुल्लित दिगदिगन्त अम्बर मधुकर
विहॅंसित वन तृण पर्ण धवलतम तुहिन हिमानी कण निर्झर
मधुर मदिर प्राणेश हॅंसी में डूब डूब उतराता चल
टेर रहा है प्रीतिपंखिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।192।।

उमड़ घुमड़ घन मोहन का संदेशा ले आये मधुकर
इधर तुम्हें रोमांच उधर वे भी पुलके होंगे निर्झर
वे भींगे होंगे आये हैं तुम्हें भींगाने को बादल
टेर रहा है मेघरागिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।193।।

तेरा जीवन गेंद गोद ले रखे गिरा दे या मधुकर
मृदु कर से सहलाये अथवा चरण ताड़ना दे निर्झर
तू उसका है जैसे चाहे तुमसे खेले खिलवाड़ी
टेर रहा है मुक्तमानसा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।194।।

कितनी करुणा है उसकी कल्पना न कर सकता मधुकर
जितना डूबेगा उतना ही आनन्दित होगा निर्झर
उसका दण्ड विधान कोप भी सदा अनुग्रह मय सुखमय
टेर रहा है त्रिवर्गफलदात्री मुरली   तेरा    मुरलीधर।।195।।


-------------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# पराजितों का उत्सव : एक आदिम संदर्भ-२ (सच्चा शरणम )

20 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 34

सुन अनजान प्राणतट का मोहाकुल आवाहन मधुकर
रस सागर की तड़प भरी सब चाहें ममतायें निर्झर
स्मरण कराता जन्म जन्म के लिये दिये अनगिन चुम्बन
टेर रहा है प्रीतिमादिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।186।।

मृदु गलबहियाँ दे बन जाता हार तुम्हारा वह मधुकर
सब अनखिला खिला देता है उसका मधु दुलार निर्झर
उसकी बाँहों की डाली में रसमय झूला झूल नवल
टेर रहा ऋतुराजनियोगा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।187।।

उसका ही विहार वृन्दावन कर अपना अंतर मधुकर
नयनों में प्राणेश मिलन का भर ले सजल सरस निर्झर
तू क्या जाने निपट अनाड़ी कब रच दे कैसी लीला
टेर रहा है चित्तचोरिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।188।।

रख स्मृति वही प्राणवल्लभ सिन्दूर रेख तेरी मधुकर
वह भावना चित्रलेखा वह कुंकुम भाल तिलक निर्झर
दूर नहीं प्रति श्वांस श्वांस में वह मंगलमय मनमोहन
टेर रहा जीवनश्रृंगारा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।189।।

भग्न पाल अनभिज्ञ खेवैया जीवन जीर्ण तरी मधुकर
क्षुभित जलधि प्रतिकूल प्रभंजन फिर भी चलता चल निर्झर
उसका है तो फिर क्या चिन्ता आयेगा खेनेवाला
टेर रहा है संकटहरणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।190।।
-------------------------------------------------------------------

अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# करुणावतार बुद्ध - 3 (सच्चा शरणम )

18 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 33

बिक जा बिन माँगे मन चाहा मोल चुका देता मधुकर
जगत छोड़ देता वह आ जीवन नैया खेता निर्झर
कठिन कुसमय शमित कर तेरा आ खटकाता दरवाजा
टेर रहा है प्रीतिपीठिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।176।।

रहे न तुम वह था न रहोगे तब भी वह होगा मधुकर
टेर रहा तेरे अंचल की छाया में लुक छिप निर्झर
भींगी पलकें पोंछ तुम्हें ले अंक भाल सहला सहला
टेर रहा है प्रीतिमेदिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।177।।

क्या होती है थकित चकोरी पी पी चन्द्र किरण मधुकर
कहाँ पी कहाँ रटते थकते चातक के न अधर निर्झर
रहो पंथ में आँख बिछाये प्रिया गमन के दिन गिनते
टेर रहा है प्रीतिचातकी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।178।।

पश्चातापी नयन सलिल दिन रात बहाता रह मधुकर
बिलख हाय मिल सका न प्रिय का मिलन महोत्सव रस निर्झर
अनायास ही अनुकंपा से आ जायेगा वह नटवर
टेर रहा है प्रीतिभामिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।179।।

जब प्रयाणरत प्राणों की होगी कम्पित बाती मधुकर
शोकाकुल आँगन बिरवा की सूखेगी छाती निर्झर
तुम्हें अंक में ले रच देगा माथे पर सौभाग्य तिलक
टेर रहा है प्रीतिमंजरी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।180।।

------------------------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# करुणावतार बुद्ध  (सच्चा शरणम )

16 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 32

अपने ही लय में तेरा लय मिला मिला गाता मधुकर
अक्षत जागृति कवच पिन्हा कर गुरु अभियान चयन निर्झर
तुमको निज अनन्त वैभव की सर्वस्वामिनी बना बना
टेर रहा है भूतिभूषणा मुरली  तेरा   मुरलीधर।।171।।

दृग खुलते झलकता पलक झंपते ही आ जाता मधुकर
बुला लिया है तो न लौटकर फिर जाने देता निर्झर
कभीं न कुम्हिलाने वाली अपनी वरमाला पहनाकर
टेर रहा है रहसरंगिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।172।।

सुख दुख पाप पुण्य दिन रजनी मरण अमरता में मधुकर
ऊर्ध्व अधः सुर असुर जीव जगदीश्वर में न बॅंधा निर्झर
निगम ‘‘रसोवैसः आनन्दोवैसः’’ कह करते गायन
टेर रहा है श्रुत्यर्थमण्डिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।173।।

श्वेत केश मुख दशन रहित कटि झुकी जरा जरजर मधुकर
रस विरहित शोणित वाहिनियाँ झूली श्लथ काया निर्झर
देखो जीवन छाया पट पर उसका यह भी चित्रांकन
टेर रहा है रचनाविशारदा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।174।।

अश्रु मुखी अनमनी म्लान रहने न तुम्हें देगा मधुकर
अपने दिनमणि पर भरोस रख तू सरसिज कलिका निर्झर
तेरी पीड़ा का निदान है प्रियतम की अम्लान हॅंसी
टेर रहा है लोमहर्षिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।175।।

14 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 31

 बार बार पथ घेर घेर वह टेर टेर तुमको मधुकर
तेरे रंग महल का कोना कोना कर रसमय निर्झर
सारा संयम शील हटाकर सटा वक्ष से वक्षस्थल
टेर रहा है हृदयवल्लभा मुरली  तेरा  मुरलीधर।।166।।

हृदय सिंधु के द्युतिमय मोती पलकों में भर भर मधुकर
सच्चा सरसिज मृदुल चरण पर अर्घ्य चढ़ाता चल निर्झर
वह पूर्णेन्दु प्राण वारिधि में स्नेहिल लहरें उठा उठा
टेर रहा है प्रीतिकातरा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।167।।

प्रेम बावरे पर यह जग कीचड़ उछालता है मधुकर
प्रेम पथिक को स्वयं बनाना पड़ता अपना पथ निर्झर
पथ इंगित करती दुलराती प्रियतम की प्रेरणा कला
टेर रहा है  प्रीतिप्रगल्भा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।168।।

अद्भुत उसका खेल बिन्दु में सिन्धु उतर आता मधुकर
लहर लहर में उठ सागर ही बिखर बिखर जाता निर्झर
नभ पट पर उडुगण लिपि में लिख नित नित नूतन संदेशा
टेर रहा है प्रीतिपत्रिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।169।।

जाने तुममें क्या पाता नित बन ठन कर आता मधुकर
तृप्त न होता पुनः पुनः वह चूम चूम जाता निर्झर
मिलन प्रतीक्षा की वेला बन करता लीला रस वर्षण
टेर रहा है मिलनमंदिरा मुरली  तेरा   मुरलीधर।।170।।

--------------------------------------------------------------

आपकी टिप्पणी से प्रमुदित रहूँगा । कृपया टिप्पणी करने के लिये प्रविष्टि के शीर्षक पर क्लिक करें । साभार ।

-------------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है ...   (सच्चा शरणम )

12 November 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 30

ज्यों तारक जल जल करते हैं धरती को शीतल मधुकर
नीर स्वयं जल जल रखता है यथा सुरक्षित पय निर्झर
वैसे ही मिट मिट प्रियतम को सत्व समर्पण कर पंकिल
टेर रहा है सत्वसंधिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।161।।

प्राणों की मादक प्याली में प्रेम सुधा भर भर मधुकर
घूँघट उठा निहार मुदित मुख तुम्हें पिलाता रस निर्झर
मोहित मन की टिमटिम करती स्नेहिल बाती उकसाकर
टेर रहा है प्रीतिपिंजरा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।162।।

उसकी स्मृति में रोती रजनी गीला पवनांचल मधुकर
उसकी स्मृति की गहन बदलियों से बोझिल अम्बर निर्झर
प्रेमासव की एक छलकती कणिका के हित लालायित
टेर रहा है प्रीतिकोकिला मुरली   तेरा    मुरलीधर।।163।।

बड़ी निराली गुणशाली सच्चे की मधुशाला मधुकर
जिसे पकड़ती उसको ही कर देती मतवाला निर्झर
निजानन्द का स्वाद चखाती उमग उमग आनन्दमयी
टेर रहा है प्रेमतरंगा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।164।।

मरना सच्चा रस तो तू सोल्लास वहीं मर जा मधुकर
यदि वह निद्रा है तो उसमें ही सहर्ष सो जा निर्झर
उसका स्नेहिल उर स्पर्शित कर बहने दे पंकिल श्वांसें
टेर रहा है स्नेहाकुंरिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।165।।

----------------------------------------------------------------
 अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# मैं तो निकल पड़ा हूँ ...(सच्चा शरणम )

----------------------------------------------------------------
आपकी टिप्पणी से प्रमुदित रहूँगा । कृपया टिप्पणी करने के लिये प्रविष्टि के शीर्षक पर क्लिक करें । साभार ।