15 December 2008

बावरिया बरसाने वाली 16

सुधि करो अंक ले मुझे कहा था अभीं अभीं चंदा निकला है
कैसे कहती ढल गयी निशा लाई है उषा वियोग- बाला है ।
बोलते कहाँ है अरुणचूड़ किस खग को उड़ते देखा है ।
अन्तर में अभीं समानांतर सप्तर्षि गणों की रेखा है ।
निकटस्थ सरित का सेतु लाँघ काफिला नहीं कोई निकला ।
अरुणिमा क्षितिज में कहाँ तुम्हें क्या दीख पड़ीं कोई चपला ।
सुनाती प्रभात की बात न अब बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३४॥


था कहा "शुक्र झांकता न मलिना उडुगण की चटकारी है ।
क्या राम- राम कह रहा कहीं देवालय बीच पुजारी है ?
है अभी पूर्ण निस्तब्ध यामिनी वायस के स्वर शांत पड़े ।
है कहाँ धेनु-दोहन-शिशु-नर्तन मौन सभी जलजात खड़े ?
मलयानिल झुरक-झुरक सहलाता कहाँ तुम्हारा मृदु आनन्?
है कहाँ भानु को चढ़ा रहे जल वाटू-तपस्वि-गण देख गगन ?
वह स्थिति न भुलाए भूल रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३५॥

05 December 2008

बावरिया बरसाने वाली 15

प्रिय ! इस विस्मित नयना को कब आ बाँहों में कस जाओगे ।
अपना पीताम्बर उढ़ा प्राण ! मेरे दृग में बस जाओगे ।
प्रिय! तंडुल-पिंड-तिला वेष्टित सी गाढ़ालिंगन समुहाई ।
युग गए काय यह जल पय-सी तव तन में नहीं समा पायी ।
हो जहाँ बसे क्या वहाँ प्राण ! कोकिला कभीं बोलती नहीं ।
जल गया मदन-तन क्या मंथर, मलयज बयार डोलती नहीं ।
सह सकती कैसे विषम बाण बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्रान निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३२॥
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मम-अधर दबा करते थे सी-सी ध्वनित सम्पुटक चुम्बन जब ।
पृथु उरु उरोज का बढ़ जाता था वसन विहीन विकम्पन तब ।
प्रिय! तेरे स्मित कपोल चिबुकाधर कुंद दशन से डंसती थी ।
मैं हार हार कर भी चुम्बन की द्युत क्रिया में फंसती थी ।
पूछा था मैं तो नित अतृप्त क्या तुम भी प्रिये ! तरसती हो ?
निद्रित पलकों में भी आ आ क्यों चपल बालिके बसती हो ?
यह मदन-विनोद-विछोह-विकल बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन की वनमाली ॥ ३३॥