21 August 2011

मुरली तेरा मुरलीधर 47

खिल हँसता सरसिज प्रसून तूँ रहा भटकता मन मधुकर
डाली सूनी रही रिक्त तू खोज न सका कमल निर्झर
विज्ञ न था निकटतम धुरी यह तेरी ही मधुर सुरभि
टेर रहा निज सौरभप्राणा मुरली तेरा मुरलीधर ॥२५१॥

हा धिक बीत रहा तट पर ही मन्द समय तेरा मधुकर
तू बैठा सिर लादे मुरझा तृण तरु दल डेरा निर्झर
क्या शून्यता निहार रहा  जो हटा पन्थ हारा हर
टेर रहा  आन्नदावर्ता मुरली तेरा मुरलीधर॥२५२॥