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सच्चा लहरी : तीन

तेरे चारों ओर वही कर रहा भ्रमण है
खुले द्वार हों तो प्रविष्ट होता तत्क्षण है 
उसकी बदली उमड़ घुमड़ रस बरसाती है
जन्म-जन्म की रीती झोली भर जाती है।

होना हो सो हो, वह चाहे जैसे खेले
उसका मन, दे सुला गोद में चाहे ले ले 
करो समर्पण कुछ न कभीं भी उससे माँगो
बस उसके संकल्पों में ही सोओ जागो।

वही पाणि पद सिर में वही हृदय धड़कन में 
शोणित में श्वासों में वाणी गमन शयन में 
’मैं’ हो गया विदा अब मेरा ईश उपस्थित 
उसके महारास में कर दो श्वाँस समर्पित।

चाहे कोई भी स्वर हो कोई भी भाषा
सब उसकी है, उसे पता सबकी परिभाषा 
’मैं उसका हूँ’ उर में यह अनुभूति बसा लो
अनुपम इस सच्चा वाणी का मर्म सम्हालो।

पुष्पवृन्द परिमल की जैसी गंध कथा है
किरणों का अरुणोदय से सम्बन्ध यथा है
तथा अश्रु की भाषा में बोलते नयन हैं
भाव प्रस्फुटन के आँसू चाक्षुषी वचन हैं।

पूर्ण अनिवर्च ईश प्रीति की पीर निराली
बरबस छलक छलक जाती नयनों की प्याली 
विह्वल उर आह्लाद जन्य उमड़ता रुदन है
ढुलक गया प्रेमाश्रु पुण्य प्रार्थना सदन है।

सब कृतियों में तुम बेहोशी में खोये हो
सपना सभी अतीत कर्म में तुम सोये हो
माया सब जो किए जा रहे नादानी में 
जागो व्यर्थ अनर्थ फेंक कूड़ेदानी में ।

रोको मत बहने दो उसके आगे दृगजल
पंकिल लोचन जल से धुल होता मन निर्मल 
तड़पन वाले को मनचाहा मिल जाता है 
आँसू से उसका सिंहासन हिल जाता है। 

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