09 March 2013

सच्चा लहरी : दो

A poetical and devotional work on sachcha
सच्चा कहता अरे बावरे! द्वारे द्वारे
घूम रहा क्यों अपना भिक्षा पात्र पसारे।
बहुत चकित हूँ, प्रबल महामाया की  माया
किससे क्या माँगू, सबको भिक्षुक ही पाया॥९॥

सब धनवान भिखारी हैं, भिक्षुक नरेश हैं
कहाँ मालकीयत जब तक वासना शेष है।
माँग बनाती हमें भिखारी यही पहेली
नृप को भी देखा फैलाये खड़ा हथेली॥१०॥

05 March 2013

सच्चा लहरी : एक

संत बहुत हैं पर सच्चा अद्भुत फकीर है
गहन तिमिर में ज्योति किरण की वह लकीर है।
राका शशि वह मरु प्रदेश की पयस्विनी है
अति सुहावनी उसके गीतों की अवनी है॥१॥

सच्चा अद्वितीय अद्भुत है, उसको जी लो
बौद्धिक व्याख्या में न फँसो, उसको बस पी लो।
मदिरा उसकी चुस्की ले ले पियो न ऊबो
उस फकीर की मादकता मस्ती में डूबो॥२॥