16 December 2012

जियरा जुड़इहैं रे सजनी (एक प्रिय-विमुक्ता का उच्छ्वास)

Photo source : Google
पीसत जतवा जिनिगिया सिरइलीं
दियवा कै दीयै भर रहलैं रे सजनी।
मिरिगा जतन बिन बगिया उजरलैं
कागा बसमती ले परइलैं रे सजनी॥

सेमर चुँगनवाँ सुगन अझुरइलैं
रुइया अकासे उधिरइलीं रे सजनी।
साजत सेजियै भइल भिनुसहरा
निनियाँ सपन होइ गइलीं रे सजनी॥

अँगना-ओसरिया में डुहुरैं दुलुरुवा
अन बिन मुँह कुम्हिलइलैं रे सजनी।
सुधियो ना लिहलैं सजन निरमोहिया
अखियौ कै लोरवा सुखइलैं रे सजनी॥

बिरथा तूँ बिलखैलू  धनि बउरहिया 
पिया अँखपुतरी बनइहैं रे सजनी।
उनहीं की सुधिया में रहु धिया लटपट 
पंकिल जियरा जुड़इहैं रे सजनी॥ 

1 comment:

  1. नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

    ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...

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