19 February 2010

मुरली तेरा मुरलीधर 45

निज प्रियतम के विशद विश्व में और न कुछ करना मधुकर
निरुद्देश्य उसके गीतों को झंकृत कर देना निर्झर
पंकिल भर देना निज कोना बहा गीतधारा प्रभुमय
टेर रहा अर्चनोद्वेलिता मुरली तेरा मुरलीधर।२४१।

जग उत्सव मे प्राणनाथ का मिला निमन्त्रण है मधुकर
आशीर्वादित हुये प्राण दृग देखे सुने श्रवण निर्झर
भीतर पहुच अतंद्र देख ले प्राणेश्वर मुखचन्द्र विमल
टेर रहा आमंत्रणस्वरिता मुरली तेरा मुरलीधर।२४२।

17 February 2010

मुरली तेरा मुरलीधर 44

गाने आया जो अनगाया गीत अभी तक वह मधुकर
वीण खोलते कसते ही सब बासर बीत गये निर्झर
सही समय आया न सज सके उचित शब्दसंभार कभी
टेर रहा समयानुकूलिनी मुरली तेरा मुरलीधर।२३६।

मारुत रोता रहा खिले पर गहगह फूल नहीं मधुकर
इच्छाओं की पीडा का ही था उरभार गहन निर्झर
गृह समीपवर्ती पथ से ही गया निकल मंथर प्रियतम
टेर रहा अमन्दपदध्वनिता मुरली तेरा मुरलीधर।२३७।

देख न सका बदन उसका स्वर सुन न सका उसका मधुकर
भवन पंथ पर मन्द चरण ध्वनि ही सुन सके श्रवण निर्झर
सेज बिछाती बीती रजनी बुला न सके सदन मे तुम
टेर रहा है मिलनमानसी मुरली तेरा मुरलीधर।२३८।

अमित वासनायें है तेरी तेरे अमित रुदन मधुकर
बार बार वह कृपा सिन्धु करता न उन्हें स्वीकृत निर्झर
दे यह शुचि उपहार बनाता अपने लायक नित्य तुम्हें
टेर रहा है स्वजनाश्रयिणी मुरली तेरा मुरलीधर।२३९।

यह दिन दिया दिया यह द्युति दी ऐसी शुभकाया मधुकर
पर जब तुच्छ वासनाओं से हुआ मुकुर मैला निर्झर
वह ओझल हो गया बनाता पूर्ण स्वीकरण योग्य तुम्हें
टेर रहा निजदिशादशिर्नी मुरली तेरा मुरलीधर।२४०।
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# मुझे प्रेम करने दो केवल मुझे प्रेम करने दो  (सच्चा शरणम )

09 February 2010

मुरली तेरा मुरलीधर - 43

भू लुण्ठित हो धूलिस्नात हो जाय न जब तक तन मधुकर।
वह निज कर में ले दुलराये तेरा लघुप्रसून निर्झर
विलख भले सुरभित न किन्तु वह पदसेवा से करे न च्युत
टेर रहा सेवासुखोदग्मा मुरली तेरा मुरलीधर।२३१।

आभूषण क्या प्रिय संगम रोधक प्राचीर नहीं मधुकर
हो सकती है एकमेव फिर युगल शरीर नहीं निर्झर
सहज सरल अनलकृंत जीवनगीत बाँसुरी मे भर भर
टेर रहा है सहजस्पन्दिनी मुरली तेरा मुरलीधर।२३२।

निज को निज कन्धे बैठाये अज्ञ दुखारी तू मधुकर
उसे क्यो न सौंपता विहँस जो अखिल भारहारी निर्झर
तेरी इच्छा का श्वाँसानिल देता दीपक ज्योति बुझा
टेर रहा अस्तित्वअर्पिता मुरली तेरा मुरलीधर ।२३३।

वहीं प्राणधन का सिंहासन वहीं चरण संस्थित मधुकर
जहाँ पतिततम महादीनतम अविदित जन संस्थित निर्झर
ओझल किये उसे गहरे मे दंभगर्भिणी मोह निशा
टेर रहा है दंभतमघ्नी मुरली तेरा मुरलीधर ।२३४।

तब तक भटकेंगे दृग तेरे बहिर्जगतगति में मधुकर
जब तक बोधा नहीं अतन्द्रित बन्द किये लोचन निर्झर
आंसू जल मे बह जायेगा पंथ बहिर्गामी पंकिल
टेर रहा अस्मिताविलीना मुरली तेरा मुरलीधर ।२३५। -------------------------------------------------------------
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# फागुन मतवारो यह ऐसो परपंच रच्यौ..  (सच्चा शरणम)