23 March 2010

मौन बैठे हो क्यों मेरे अशरण शरण..

मौन बैठे हो क्यो मेरे अशरण शरण।
इस अभागे को क्या मिल सकेगा नहीं,
हे कृपामय तेरा कमल-कोमल-चरण।
मौन बैठे हो क्यो मेरे अशरण शरण।

10 March 2010

हे देव तेरा गुणगान मेरे..

दिनचर्या तेरी मेरी सेवा हो
कुछ ऐसी कमाई हो जाये।
हे देव तेरा गुणगान मेरे
जीवन की पढ़ाई हो जाये।।

यह जग छलनामय क्षण भंगुर
खिल कर झड़ जाते फूल यहाँ।
अनूकूल स्वजन भी दुर्दिन में
हो जाते हैं प्रतिकूल यहाँ।
मेरे जीवन का सब कर्ता-धर्ता
सच्चा साँई हो जाये-
हे देव तेरा गुणगान 0.................................।।1।।

07 March 2010

मुरली तेरा मुरलीधर 46

सहनशील रजकण प्रशान्त बन प्रभुपथ में बिछ जा मधुकर
किसी भाँति उसके पदतल मे ललक लिपट लटपट निर्झर
प्राणकुंज के सुमन में सुन उसकी मनहर बोली
टेर रहा अर्पणानुभावा मुरली तेरा मुरलीधर ॥२४६॥

हो न रही मारुत सिहरन की क्या अनुभूति तुम्हें मधुकर
क्या न सुन रहे दूर तरंगित राग रागिनी स्वर निर्झर
बहा जा रहा है प्रियतम स्वर छूता अपर कूल पंकिल
टेर रहा है अनुरक्तिअन्तरा मुरली तेरा मुरलीधर॥२४७॥

19 February 2010

मुरली तेरा मुरलीधर 45

निज प्रियतम के विशद विश्व में और न कुछ करना मधुकर
निरुद्देश्य उसके गीतों को झंकृत कर देना निर्झर
पंकिल भर देना निज कोना बहा गीतधारा प्रभुमय
टेर रहा अर्चनोद्वेलिता मुरली तेरा मुरलीधर।२४१।

जग उत्सव मे प्राणनाथ का मिला निमन्त्रण है मधुकर
आशीर्वादित हुये प्राण दृग देखे सुने श्रवण निर्झर
भीतर पहुच अतंद्र देख ले प्राणेश्वर मुखचन्द्र विमल
टेर रहा आमंत्रणस्वरिता मुरली तेरा मुरलीधर।२४२।

17 February 2010

मुरली तेरा मुरलीधर 44

गाने आया जो अनगाया गीत अभी तक वह मधुकर
वीण खोलते कसते ही सब बासर बीत गये निर्झर
सही समय आया न सज सके उचित शब्दसंभार कभी
टेर रहा समयानुकूलिनी मुरली तेरा मुरलीधर।२३६।

मारुत रोता रहा खिले पर गहगह फूल नहीं मधुकर
इच्छाओं की पीडा का ही था उरभार गहन निर्झर
गृह समीपवर्ती पथ से ही गया निकल मंथर प्रियतम
टेर रहा अमन्दपदध्वनिता मुरली तेरा मुरलीधर।२३७।

देख न सका बदन उसका स्वर सुन न सका उसका मधुकर
भवन पंथ पर मन्द चरण ध्वनि ही सुन सके श्रवण निर्झर
सेज बिछाती बीती रजनी बुला न सके सदन मे तुम
टेर रहा है मिलनमानसी मुरली तेरा मुरलीधर।२३८।

अमित वासनायें है तेरी तेरे अमित रुदन मधुकर
बार बार वह कृपा सिन्धु करता न उन्हें स्वीकृत निर्झर
दे यह शुचि उपहार बनाता अपने लायक नित्य तुम्हें
टेर रहा है स्वजनाश्रयिणी मुरली तेरा मुरलीधर।२३९।

यह दिन दिया दिया यह द्युति दी ऐसी शुभकाया मधुकर
पर जब तुच्छ वासनाओं से हुआ मुकुर मैला निर्झर
वह ओझल हो गया बनाता पूर्ण स्वीकरण योग्य तुम्हें
टेर रहा निजदिशादशिर्नी मुरली तेरा मुरलीधर।२४०।
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# मुझे प्रेम करने दो केवल मुझे प्रेम करने दो  (सच्चा शरणम )

09 February 2010

मुरली तेरा मुरलीधर - 43

भू लुण्ठित हो धूलिस्नात हो जाय न जब तक तन मधुकर।
वह निज कर में ले दुलराये तेरा लघुप्रसून निर्झर
विलख भले सुरभित न किन्तु वह पदसेवा से करे न च्युत
टेर रहा सेवासुखोदग्मा मुरली तेरा मुरलीधर।२३१।

आभूषण क्या प्रिय संगम रोधक प्राचीर नहीं मधुकर
हो सकती है एकमेव फिर युगल शरीर नहीं निर्झर
सहज सरल अनलकृंत जीवनगीत बाँसुरी मे भर भर
टेर रहा है सहजस्पन्दिनी मुरली तेरा मुरलीधर।२३२।

निज को निज कन्धे बैठाये अज्ञ दुखारी तू मधुकर
उसे क्यो न सौंपता विहँस जो अखिल भारहारी निर्झर
तेरी इच्छा का श्वाँसानिल देता दीपक ज्योति बुझा
टेर रहा अस्तित्वअर्पिता मुरली तेरा मुरलीधर ।२३३।

वहीं प्राणधन का सिंहासन वहीं चरण संस्थित मधुकर
जहाँ पतिततम महादीनतम अविदित जन संस्थित निर्झर
ओझल किये उसे गहरे मे दंभगर्भिणी मोह निशा
टेर रहा है दंभतमघ्नी मुरली तेरा मुरलीधर ।२३४।

तब तक भटकेंगे दृग तेरे बहिर्जगतगति में मधुकर
जब तक बोधा नहीं अतन्द्रित बन्द किये लोचन निर्झर
आंसू जल मे बह जायेगा पंथ बहिर्गामी पंकिल
टेर रहा अस्मिताविलीना मुरली तेरा मुरलीधर ।२३५। -------------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# फागुन मतवारो यह ऐसो परपंच रच्यौ..  (सच्चा शरणम)

22 January 2010

मुरली तेरा मुरलीधर - 42


वह इच्छुक है सुनने को तेरे गीतों का स्वर मधुकर
आ आ मुख निहार जाता है नीर नयन में भर निर्झर
सरस तरंगित उर कर अपना बाँट रहा आनन्द विभव
टेर रहा सुख गीत गुंजिता मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२६॥

सुन वह कैसे गाता तूँ विस्मय विमुग्ध सुन-सुन मधुकर
इस नभ से उस नभ तक करता आलोकित वह स्वर निर्झर
उसके स्वर में स्वर संयुत कर विह्वल गायन हेतु मचल
टेर रहा रस भाव विमुग्धा मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२७॥

धूल बीच निज अन्तर के सारे दुर्भाव मिला मधुकर
निज उर में प्राणेश प्रीति का विमल प्रसून खिला निर्झर
क्या न पता तेरे अंगों पर प्रियतम का जीवित स्पंदन
टेर रहा है प्राणस्पर्शिनी  मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२८॥

निज चिन्तन से सब असत्य का कर दे उन्मूलन मधुकर
वह तो सत्य वही है जिससे ज्योतित उर चिन्तन निर्झर
पाणि अपावन कर सकते कैसे पावन पद प्रच्छालन
टेर रहा नख-शिखा पावनी मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२९॥

क्या अछोर कर्म सागर में श्रम कर कर हारा मधुकर
स्वेदसिक्त श्लथ सुखी हो सका नहीं बिचारा मन निर्झर
हो समीप स्थित शांति सदन प्रिय निर्निमेष मुख-चन्द्र निरख
टेर रहा दर्शनानुरक्ता मुरली तेरा मुरलीधर ॥२३०॥

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# आया है प्रिय ऋतुराज ...  (सच्चा शरणम )

05 January 2010

मुरली तेरा मुरलीधर 41


तुम गुरु स्वयं शिष्य मन तेरा प्रथम सुधारो मन मधुकर
जग सुधार कामना मत्त मत जग में करो गमन निर्झर ।
करता विरत कृष्ण-चिन्तन से जगत राग द्वेषादि ग्रसित
टेर रहा है मनसंयमिनी मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२१॥

स्वयं कृपालु बनो मन पर दो उसे प्रबोधन स्वर मधुकर
प्यारे अब बनना न किसी का प्रियतम प्रिया तनय निर्झर।
अपनी पूरी शक्ति लगा दो बना उसे हरि चरण भ्रमर
टेर रहा है मनस्तोषिणी मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२२॥

समय न गंवा व्यर्थ  चिन्तन में अन्तस्तल में जग मधुकर
मुट्ठी में बाँधता लहर की झाग अज्ञ फेनिल निर्झर ।
सागर की गहराई में हीरे हैं रहा टटोल कहाँ
टेर रहा अस्तित्वबोधिनी मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२३॥

तुम्हें अनंत कर दिया उसने ऐसा सुखदाता मधुकर
पुनः पुनः कर रिक्त पुनः नव जीवन भर जाता निर्झर ।
तेरी लघु वंशी से घाटी-घाटी गाता गीत नवल
टेर रहा अनवरत सहचरी मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२४॥

आती भेंट उतर अनंत की तेरे लघुकर में मधुकर
अमृत स्पर्श उसके हाथों का रचता हर्श सिन्धु निर्झर ।
युग बीतते उड़ेल रहा भरने को फिर भी शेष सदन
टेर रहा अक्षयसुखकोषा मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२५॥


चित्र साभार : http://radhemohan.blogspot.com
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ-
# करुणावतार बुद्ध-9 ....(सच्चा शरणम)