30 December 2009

सुधि उमड़ती रहे बदलियों की तरह ...

सुधि उमड़ती रहे बदलियों की तरह    ।
तुम झलकते रहो बिजलियों की तरह ॥

प्रभु हृदय में मेरे तुमको होगी घुटन
मैने गंदा किया सारा वातावरण 
ऐसे हिय में बिरह की सलाई लगा
प्राण सुलगें अगरबत्तियों की तरह     ||1||

दृष्टि बस फेर दो कष्ट कट जायेगा
कुछ तेरा सच्चे बाबा न घट जायेगा
उर की क्यारी में भगवन खिलो बन सुमन
मन मचलने लगे तितलियों की तरह ||2||

मैं हूँ दुनिया का सबसे बुरा आदमी
बोझ ढ़ोने में यदि चाहते हो कमी
मेरा अपराध-तरु झोर दो झर पड़ें
पाप सूखी हुई पत्तियों की तरह        ||3||

तेरी सुधि से बिलग मत रहे एक क्षण
मेरी हर श्वांस, हर रोम, हर रक्त-कण
अपनी चुटकी का बल आप देते रहें
मै थिरकता रहूँ तकलियों की तरह  ||4||

सोचते कौन तुम मेरी नेकी - बदी
ताल ‘पंकिल’ हूँ मैं तुम हो गंगा नदी
प्रेम चारा चुँगाते चलो चाव से
मैं निगलता चलूँ मछलियों की तरह  ||5||

 photo source : wikimedia
------------------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ - 
# शायद आज मैं मिलूँगा तुमसे ...  (सच्चा शरणम )