Phone : +91 5412 246 707

मुरली तेरा मुरलीधर 20

इन्द्रिय घट में भक्ति रसायन भर भर चखता रह मधुकर
तन्मय चिन्तन सच्चा रस में देता तुम्हें बोर निर्झर
कर त्रिकाल उस महाकाल के चरणामृत का आस्वादन
टेर रहा नैवेद्यतुलसिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।111।।

मन तो नित गिरता रहता है सलिल सदृश नीचे मधुकर
कृष्ण स्मरण का यंत्र उसे ले उर्ध्व बना देता निर्झर
सब संयोग वियोग जगत का हरि स्मृति में न वियोग कभीं
टेर रहा संयोगसंधिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।112।।
मिली वासना से ही काया इसे  स्मरण रखना मधुकर
फिर जैसी वासना तुम्हारी वैसा होगा तन निर्झर
बनना नहीं जनक जननी अब नहीं किसी की त्रिया तनय
टेर रहा वैराग्यदीपिका  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।113।।

इस मल मूत्रभरित तन में मत प्रेम बाँटता फिर मधुकर
प्रेम पात्र बस सच्चा प्रियतम संसृति में न भटक निर्झर
भुक्ता भोग्य सभी मिट जाते रस ही रस वह प्राणेश्वर
टेर रहा है रसकदम्बिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।114।।

नहीं काष्ठगत अप्रकट पावक ऊष्मा देता है मधुकर
भीतर की प्रकटिता अग्नि जब तब होती दाहक निर्झर
बाहर भीतर के नारायण को कर एकाकार स्वरित
टेर रहा सारूप्यसुन्दरी   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।115।।

---------------------------------------------------

टिप्पणी करने के लिये प्रविष्टि के शीर्षक पर क्लिक करें …

---------------------------------------------------

अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# मैंने जो क्षण जी लिया है … (सच्चा शरणम )

Share it on

Amazed And Thinking! Have some questions?

Contact Form

Name

Email *

Message *