Phone : +91 5412 246 707

मुरली तेरा मुरलीधर 17

वह कितनी सौभाग्यवती है अभिरामा वामा मधुकर
कुलानन्दिनी कीर्तिसुता की अंश स्वरुपा वह निर्झर
उसकी पद नख द्युति से कर ले अपना अंतर तिमिर हरण
टेर रहा है दुरितदारिणी   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।96।।

रो ले जी भर कर रो ले रे अश्रु अमोलक धन मधुकर
प्रियतम का पद कमल पखारें तेरे स्नेह नयन निर्झर
अभिनन्दन कर अश्रु अर्घ्य से लोक लाज कर आज विदा
टेर रहा है सलिलार्द्रलोचना  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।97।।

कृपण न बन अंतर की पीड़ा दृग में भरने दे मधुकर
छिपा न मूढ़ टपक जाने दे नयनों का व्याकुल निर्झर
ये संवादी अश्रु तुम्हारी सब कह देंगे व्यथा कथा
टेर रहा है पलकाश्रयिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।98।।

वृथा कटे जा रहे दिवस तू फूट फूट कर रो मधुकर
बिना रुदन के कभी उमड़ कर प्रवहित कहाँ प्राण निर्झर
ऋणी बना सकती प्रियतम को तेरी लघु आँसू कणिका
टेर रहा है रागवर्धिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।99।।

जो होगा होने दे पहले उससे भेंट ललक मधुकर
सच्चा रति से निर्मल कर ले अंतर का पंकिल निर्झर
समय कहाँ रे कब चेतेगा कब से देख रहा है पथ
टेर रहा है सम्प्रबोधिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।100।।

 ---------------------------------------------------------------------
आपकी टिप्पणी से प्रमुदित रहूँगा । कृपया टिप्पणी करने के लिये प्रविष्टि के शीर्षक पर क्लिक करें । साभार ।
----------------------------------------------------------------------

अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# हिन्दी दिवस पर क्वचिदन्यतोऽपि.....   (सच्चा शरणम )
Share it on

Amazed And Thinking! Have some questions?

Contact Form

Name

Email *

Message *