28 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 21

स्वाद सुधा में है पदार्थ में स्वाद न पायेगा मधुकर
सुख तो सब उसे सच्चे प्रिय में कहाँ खोजता रस निर्झर
मन गृह में जम गयी धूल को पोंछ डाल आनन्द पथी
टेर रहा संसारनाशिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।116।।

यदि संस्कार वासनाओं से पंकिल बना रहा मधुकर
लाख रचो केसर की क्यारी कस्तूरी का रस निर्झर
अरे प्याज तो प्याज रहेगी वहाँ सुरभि खोजना वृथा
टेर रहा है सुरभिनिमग्ना मुरली   तेरा    मुरलीधर।।117।।

विश्व प्रकट परमात्मा ही है तुम शरीर यह भ्रम मधुकर
तुम ईश्वर हो ईश्वर के हो बोध न कर विस्मृत निर्झर
ईश बना मानव तो फिर से मानव ईश बनेगा ही
टेर रहा है निजस्वरूपिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।118।।

तुम अपने को देह मान ही जग से अलग थलग मधुकर
जीव  मान कर ही अनन्त पावक का एक स्फुलिंग निर्झर
आत्म स्वरूप समझ लेते ही फिर विराट हो विश्व तुम्हीं
टेर रहा ब्रह्माण्डगोचरा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।119।।


कृष्ण प्रीति सरि में न नहाया खाली हाथ गया मधुकर
रिक्त हस्त ही अपर जन्म में फिर रह जायेगा निर्झर
कण कण में झंकृत है उसकी स्वर लहरी उल्लासमयी
टेर रहा है योनिरुत्तमा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।120।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# अति प्रिय तुम हमसे अनन्य हो गये..  (सच्चा शरणम )

26 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 20

इन्द्रिय घट में भक्ति रसायन भर भर चखता रह मधुकर
तन्मय चिन्तन सच्चा रस में देता तुम्हें बोर निर्झर
कर त्रिकाल उस महाकाल के चरणामृत का आस्वादन
टेर रहा नैवेद्यतुलसिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।111।।

मन तो नित गिरता रहता है सलिल सदृश नीचे मधुकर
कृष्ण स्मरण का यंत्र उसे ले उर्ध्व बना देता निर्झर
सब संयोग वियोग जगत का हरि स्मृति में न वियोग कभीं
टेर रहा संयोगसंधिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।112।।
मिली वासना से ही काया इसे  स्मरण रखना मधुकर
फिर जैसी वासना तुम्हारी वैसा होगा तन निर्झर
बनना नहीं जनक जननी अब नहीं किसी की त्रिया तनय
टेर रहा वैराग्यदीपिका  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।113।।

इस मल मूत्रभरित तन में मत प्रेम बाँटता फिर मधुकर
प्रेम पात्र बस सच्चा प्रियतम संसृति में न भटक निर्झर
भुक्ता भोग्य सभी मिट जाते रस ही रस वह प्राणेश्वर
टेर रहा है रसकदम्बिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।114।।

नहीं काष्ठगत अप्रकट पावक ऊष्मा देता है मधुकर
भीतर की प्रकटिता अग्नि जब तब होती दाहक निर्झर
बाहर भीतर के नारायण को कर एकाकार स्वरित
टेर रहा सारूप्यसुन्दरी   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।115।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# मैंने जो क्षण जी लिया है … (सच्चा शरणम )

22 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 19

अहं रहित मह मह महकेंगे तेरे प्राण सुमन मधुकर
स्निग्ध चाँदनी नहला देगी चूमेगा मारुत निर्झर
तुम्हें अंक में ले हृदयेश्वर हलरायेगा मधुर मधुर
टेर रहा है मूलाधारा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।106।।

उर वल्लभ के पद शतदल में मरना मिट जाना मधुकर
रस समाधि में  खो जाते ही होगा सब अशेष निर्झर
अनजाने अबाध उमड़ेगी भावों की उर्मिल सरिता
टेर रहा है भावमालिनी  मुरली  तेरा  मुरलीधर।।107।।

एक न एक दिवस जीवन में मरण सुनिश्चित है मधुकर
कभीं मृत्यु विस्मृत न रहे यह सुधि जागृत रखना निर्झर
सात दिनों में कोई दिन निश्चित आयेगा लिये मरण
टेर रहा है मृत्युविजयिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।108।।

संसारी तू तन सम्हालता मन विचरता मुक्त मधुकर
तुम्हे न पता मृत्यु तन की मन साथ सदा रहता निर्झर
मन की ही सम्हाल करता चल सदा विवेकी धीर मना
टेर रहा चैतन्यरुपिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।109।।

तू न जगत का है अपने प्रभु का है यही सोच मधुकर
नहीं किसी प्रमदा का नर का केवल हरि का ही निर्झर
जीवन मरण बना ले दोनों सच्चा स्मृतिरसमय पंकिल
टेर रहा है मंगलसदनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।110।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

# जागो मेरे संकल्प मुझमें … (सच्चा शरणम )

20 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 18

अपनी ही विरचित कारा में बंधा तड़पता तू मधुकर
अपनी ही वासना लहर से पंकिल किया प्राण निर्झर
उस प्रिय की कर पीड़ा हरणी चरण कमल की सुखद शरण
टेर रहा है प्रीतिपंकिला  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।101।।

गीत वही तेरे अधरों पर स्वर उसका ही है मधुकर
नयन तुम्हारे हैं जो उनकी ज्योति वही पुतली निर्झर
भर आये दृग की भाशा का वह पढ़ पढ़ संवादी स्वर
टेर रहा है मर्मभेदिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।102।।

अधरों पर मुस्कान सजा भर नयनों में पानी मधुकर
अपने प्राणों के राजा को भेंज प्रेम पाती निर्झर
गीत अधर पर सुधि सिरहाने रोम रोम में भर सिहरन
टेर रहा है प्रीतिविह्वला   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।103।।

कहाॅं भाग कर जायेगा प्राणेश वाटिका से मधुकर
तुम्हें मिलेगा गीत सुनाता नित नित नवल नवल निर्झर
शरद शिशिर हेमन्त वसन्ती ऋतु रवि शशि में हो द्युतिमय
टेर रहा है विराटवपुशीला  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।104।।

उसके सरसिज पद परिमल से निज सिर पंकिल कर मधुकर
क्या पाया उसको न सोच क्या खोया यही देख निर्झर
रिक्त बनोगे तो पाओगे प्रियतम प्राण रसाकर्शण
टेर रहा है निरहंकारा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।105।।

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# कैसे ठहरेगा प्रेम जन्म-मृत्यु को लाँघ .... (सच्चा शरणम)

14 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 17

वह कितनी सौभाग्यवती है अभिरामा वामा मधुकर
कुलानन्दिनी कीर्तिसुता की अंश स्वरुपा वह निर्झर
उसकी पद नख द्युति से कर ले अपना अंतर तिमिर हरण
टेर रहा है दुरितदारिणी   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।96।।

रो ले जी भर कर रो ले रे अश्रु अमोलक धन मधुकर
प्रियतम का पद कमल पखारें तेरे स्नेह नयन निर्झर
अभिनन्दन कर अश्रु अर्घ्य से लोक लाज कर आज विदा
टेर रहा है सलिलार्द्रलोचना  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।97।।

कृपण न बन अंतर की पीड़ा दृग में भरने दे मधुकर
छिपा न मूढ़ टपक जाने दे नयनों का व्याकुल निर्झर
ये संवादी अश्रु तुम्हारी सब कह देंगे व्यथा कथा
टेर रहा है पलकाश्रयिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।98।।

वृथा कटे जा रहे दिवस तू फूट फूट कर रो मधुकर
बिना रुदन के कभी उमड़ कर प्रवहित कहाँ प्राण निर्झर
ऋणी बना सकती प्रियतम को तेरी लघु आँसू कणिका
टेर रहा है रागवर्धिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।99।।

जो होगा होने दे पहले उससे भेंट ललक मधुकर
सच्चा रति से निर्मल कर ले अंतर का पंकिल निर्झर
समय कहाँ रे कब चेतेगा कब से देख रहा है पथ
टेर रहा है सम्प्रबोधिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।100।।

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# हिन्दी दिवस पर क्वचिदन्यतोऽपि.....   (सच्चा शरणम )

12 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 16

भर जाते नख शिख पावस घन विकल बरसने को मधुकर
जितनी प्यासी भू उतने ही प्यासे हैं नीरद निर्झर
तूँ जितना व्याकुल उतना ही व्याकुल है तेरा प्राणेश्वर
टेर रहा उद्वेलितान्तरा  मुरली तेरा  मुरलीधर।।91।।
इतना सुख इतनी सुन्दरता इतनी क्रीड़ायें मधुकर
इतनी अभिलाषायें इतनी रसमय आशायें निर्झर
और कहाँ केवल उसमें ही उसमें रम उसका ही बन
टेर रहा है नेहनिगमना  मुरली तेरा  मुरलीधर।।92।।
उस प्रिय की तज अमृत बिन्दु पी रहा हलाहल क्यों मधुकर
उसके रंग में क्यों न बावरे रंग देता जीवन निर्झर
देख मनोहर शरद चन्द्र सी हॅंसी विषाल विमल लोचन
टेर रहा है छविवारिषा  मुरली  तेरा  मुरलीधर।।93।।
भाव अभाव शुभाशुभ सुख दुख उसके वेणु रंध्र मधुकर
कौन छिद्र कब खोल बजा दे मौन करे किसको निर्झर
उसकी लीला का विलास ही आगत विगत अनागत सब
टेर रहा भवविभवकारिणी मुरली  तेरा  मुरलीधर।।94।।
नेति नेति कह कह श्रुति करती नित जिसका बखान मधुकर
रस पिपासु खोजता चिरंतन वही कृष्ण राधा निर्झर
इन्द्रिय वृन्द गोपिकायें है आत्मा ही  राधारानी
टेर रहा है रासपूर्णिमा  मुरली  तेरा   मुरलीधर।।95।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# कानून ताज़ीरात शौहर : भारतेन्दु हरिश्चन्द्र-3......(सच्चा शरणम )

08 September 2009

विनय की कविता (ऑडियो)

पाँच-छः वर्ष पहले हमारे कस्बे में हुए एक कवि-सम्मेलन, जो आकाशवाणी वाराणसी के तत्कालीन निदेशक श्री शिवमंगल सिंह ’मानव” की पुस्तक के विमोचन पर आयोजित था व जिसकी अध्यक्षता श्री चन्द्रशेखर मिश्र जी ने की थी, में बाबूजी द्वारा पढ़ी गयी भोजपुरी कविता की बमुश्किल रिकार्डेड ऑडियो फाइल प्रस्तुत है । इसमें बाबूजी ने जगतजननी के चरणों में अपना विनय प्रदर्शित किया है -




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# रमणी के नर्म वाक्यों से खिल उठा मंदार (वृक्ष-दोहद....).... सच्चा शरणम

06 September 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 15

वह अनकहे स्नेह चितवन से उर में धँस जाता मधुकर
इस जीवन के महाकाव्य की सबसे सरस पंक्ति निर्झर
जन अंतर के रीते घट में भरता पल पल सुधा सलिल
टेर रहा है विभवभूषणा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।86।।
मरना उसके लिये उसी के हित ही हो जीना मधुकर
उसको ही ले तैर उसी को ले कर डूब यहाँ निर्झर
कंध देश पर रख तुमको परिरंभण में ले बचा बचा
टेर रहा सौभाग्यवर्धिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।87।।
अंगुलि से पोंछता कपोलों पर ढुलकते अश्रु मधुकर
निज अम्बर से ढंक देता सिहरता तुम्हारा तन निर्झर 
श्वांसों से भी अति समीप आ आलिंगन में बाँध तुम्हें
टेर रहा है भावविभोरा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।88।।
किसे पता कब डूब जाय यह कागज की नौका मधुकर
पहले उससे मिल ले पीछे जो इच्छा हो कर निर्झर
प्राण विहंगम विषम पींजरे में छटपटा रहा कब से
टेर रहा मुक्तअम्बरा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।89।।
बॅंध जाना बाँधना भली विधि उसने सीखा है मधुकर
हिला मृदुल दूर्वा दल अंगुलि बुला रहा पल पल निर्झर
पर्वत पर्वत शिखर शिखर पर गुंजित कर सस्वर वंशी
टेर रहा है स्नेहिलरागा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।90।।


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# गुरु की पाती....... (सच्चा शरणम )