24 August 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 14

कोटि काम सुन्दर गुण मन्दिर कोटि कला नायक मधुकर
अपने हृदयेश्वर के आगे थिरक थिरक नाचो निर्झर
उर वृन्दावन चारी को मन दे उनके मन वाला बन
टेर रहा गठबंधनोत्सुका मुरली तेरा मुरलीधर।।81।।

पतिव्रतरता कीर्ति वनिता पुंश्चली नहीं प्रमदा मधुकर
एक मात्र सच्चे प्रभु का ही उसने किया वरण निर्झर
उसकी आशा छोड़ ललक कर जीवन धन का आलिंगन
टेर रहा पुरुषोत्तमाश्रया मुरली तेरा मुरलीधर।।82।।

आँख बिछा दे इसी मार्ग से आने वाला है मधुकर
छलक छलक फिर फिर भरने दे व्याकुल विरह नयन निर्झर
वह आँखों में आँख डालकर रस धाराधर मंद हसन
टेर रहा है स्नेहस्निग्धिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।83।।

सच्चे में सब भाॅंति समाहित सदा तुम्हारा हित मधुकर
डूब उसी में वहीं तरंगित अद्भुत मोहन रस निर्झर
मत तट पर रुक बह धारा में उसकी लहरों बीच बिछल
टेर रहा अंतस्तरंगिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।84।।

जीवन जीर्ण तरी सागर में हिचकोले खाती मधुकर
बिन पतवार न कोई खेवनहार अथाह प्रलय निर्झर
विषम काल में परम हितैशी सच्चा दुख दारिद्र्य दमन
टेर रहा है कल्पविटपिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।85।।

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22 August 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 13

बस अपने ही लिये रचा है तुमको प्रियतम ने मधुकर
अन्य रचित उसकी चीजों पर क्यों मोहित होता निर्झर
श्वांस श्वांस में बसा तुम्हारे रख अपना विश्वास अचल
टेर रहा है संततलब्धा मुरली तेरा मुरलीधर।।76।।

जीने की वासना न रख मत मरने की वांछा मधुकर
मात्र प्रतीक्षा में बैठा रह कब कैसी आज्ञा निर्झर
सोच जगत को बना जगत का उसको सोच उसी का बन
टेर रहा है चिंतनाश्रया मुरली तेरा मुरलीधर।।77।।

वैसे ही रह जग में जैसे रसना रहती है मधुकर
लाख भले घृत चख ले होती किन्तु न स्निग्ध कभीं निर्झर
इनसे उनसे तोड़ उसी से पंकिल नाता जोड़ सखे
टेर रहा भक्तानुकंपिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।78।।

कुटिल रीछनी यथा गुदगुदा करती प्राण हरण मधुकर
ललचा ललचा तथा मारती विषय वासनायें निर्झर
जग के कच्चे कूप कूल पर सम्हल सम्हल के बढ़ा चरण
टेर रहा है भ्रमोत्पाटिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।79।।

मत अशान्त हो विलख न सोया है सच्चा प्रियतम मधुकर
दुख की श्यामल जलद घटा से ही झरता सुख का निर्झर
सुख उसका मुख चन्द्र कष्ट है उसकी कुंचित कच माला
टेर रहा है सर्वकामदा मुरली तेरा मुरलीधर।।80।।

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06 August 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 12

नहीं भागते हुए जलद के संग भागता नभ मधुकर
चलते तन के संग न चलता कभीं मनस्वी मन निर्झर
किससे क्या लेना देना तेरा तो सच्चा से नाता
टेर रहा अपनत्ववर्षिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।71।।

प्रेम भरे लोचन प्रियतम के हित ही खोल रसिक मधुकर
और कहाँ रस रसाभास का बहता व्यभिचारी निर्झर
विश्व वाटिका के माली को दे दे अपने प्राण सुमन
टेर रहा प्रबलपिपासा मुरली तेरा मुरलीधर।।72।।

विरह ताप से प्राणनाथ के तू न कभीं तड़पा मधुकर
क्षुधित तृषित ज्यों वारि असन हित फिरता विकल व्यथित निर्झर
रे कर दे पाताल गगन को एक कृष्ण प्रेमी पगले
टेर रहा पुरुषार्थरुपिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।73।।

तेरा चिंतन ही है तेरे प्राणों का दर्पण मधुकर
उससे कहाँ छिपाना जिसने देखा सारा तन निर्झर
अंतर्मुख हो बैठ पास में उसके मृदुल पलोट चरण
टेर रहा है हृदयवल्लभा मुरली तेरा मुरलीधर।।74।।

मनतरंग निग्रह में बहता है आनन्द परम मधुकर
यह अनुभव होते ही क्षण में होता मन नीरस निर्झर
प्रभु चिन्तन ही विधि जग चिन्तन है निषेधमय पथ पंकिल
टेर रहा है विधिविधायिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।75।।

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