19 July 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 11

अगणित जन्मों की ले दारुण कर्मश्रृंखलायें मधुकर
जब जो भी दीखता उसी से व्याकुल पूछ रहा निर्झर
उसका कौन पता बतलाये नाम रुप गति अकथ कथा
टेर रहा करुणासाध्या मुरली तेरा मुरलीधर।।66।।

क्या कण कण वासी अनन्त का अन्वेषण संभव मधुकर
स्वयं भावना समझ करुण वह पास उतर आता निर्झर
चन्द्र दिवाकर स्वयं कृपाकर करते ज्योर्तिमय त्रिभुवन
टेर रहा स्वजनांकमालिका मुरली तेरा मुरलीधर।।67।।

तृशित चंचु चातक तुम सच्चा स्वाति मेघ माला मधुकर
तुम पतझर पूरित कानन वह प्रियतम वासंती निर्झर
तुम चकोर वह चंद्र मयूरी तुम वह श्रावण जलज सजल
टेर रहा अंतराकर्षिणी मुरली तेरा मुरलीधर।।68।।

रोता गगन बिलखती धरती दहक रहा पावक मधुकर
उबल रहा पाथोधि प्रकम्पित मारुत का अंतर निर्झर
उद्वेलित वन खग पुकारते वह सच्चा प्राणेश कहाँ
टेर रहा है पीरप्रणयिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।69।।

प्रभु तुमको जानते अपर फिर जाने मत जाने मधुकर
तेरा सच्चा से परिचय फिर मिले न मिले अपर निर्झर
उस हृदयस्थ परम प्रियतम की चरण शरण ही कल्याणी
टेर रहा करुणापयोधरा मुरली तेरा मुरलीधर।।70।।



09 July 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 10

आह्लादित अंतर वसुंधरा दृग मोती ले ले मधुकर
भावतंतु में गूंथ हृदय की मधुर सुमन माला निर्झर
पिन्हा ग्रीव में आत्मसमर्पण कर होती कृतार्थ धरणी
टेर रहा सर्वस्वस्वीकृता मुरली तेरा मुरलीधर।।61।।

अगरु धूम से उड़े जा रहे अम्बर में जलधर मधुकर
सुर धनु की पहना देते उसको चपला माला निर्झर
नीर बरस कर अघ्र्य आरती करती घन विद्युत माला
टेर रहा मधुरामनुहारा मुरली तेरा मुरलीधर।।62।।

तुच्छ न कह ठुकराना वाला वह तेरा अर्पण मधुकर
लघु पद सरिता को भी उर में भरता विशद सिंधु निर्झर
लतिकाओं की वेदी में खेला करते लघु ललित सुमन
टेर रहा प्रतिकणक्शणपर्वा मुरली तेरा मुरलीधर।।63।।

जड़ पारसमणि छू लोहा भी कुंदन हो जाता मधुकर
प्राणनाथ सच्चा प्रियतम तो परम चेतना का निर्झर
स्नेहमयी ममता से तुमको सटा हृदय से हृदयेश्वर
टेर रहा परिवर्तनप्राणा मुरली तेरा मुरलीधर।।64।।

भले चपल अलि कुटिल कलुशमय पर उसका ही तू मधुकर
सभी निर्धनों का धन वह सब असहायों का बल निर्झर
लांछित होकर भी न हिरण को कभीं त्याग देता हिमकर
टेर रहा स्वजनाश्रयशीला मुरली तेरा मुरलीधर।।65।।


05 July 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 9

किससे मिलनातुर निशि वासर व्याकुल दौड़ रहा मधुकर
सच्चे प्रभु के लिये न तड़पा बहा न नयनों से निर्झर
व्यर्थ बहुत भटका उनके हित अब दिनरात बिलख पगले
टेर रहा है अश्रुमालिनी   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।56।।

सूर्यकान्तमणि सुभग सजाकर अम्बर थाली में मधुकर
उषा सुन्दरी अरुण आरती करती उसकी नित निर्झर
सिन्दूरी नभ से मुस्काता वह सच्चा सुषमाशाली
टेर रहा है किरणमालिनि मुरली   तेरा  मुरलीधर।।57।।

उडुगण मेचक मोर पंख का गगन व्यजन ले कर मधुकर
झलता पवन विभोरा रजनी पद पखारती रस निर्झर
तारकगण की दीप मालिका सजा मनाती दीवाली
टेर रहा ब्रह्माण्डवंदिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।58।।

उडुमोदक विधु दुग्ध कटोरा व्योम पात्र में भर मधुकर
सच्चे प्रिय को भोग लगाती मुदित यामिनी नित निर्झर
किरण तन्तु में गूंथ पिन्हाता हिमकर तारकमणिमाला
टेर रहा संसृतिमहोत्सवा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।59।।

सरित नीर सीकर शीतल ले सरसिज सुमन सुरभि मधुकर
करता व्यजन विविध विधि मंथर मलय प्रभंजन मधु निर्झर
सलिल सुधाकण अर्घ्य चढ़ाता उमग उमग कर रत्नाकर
टेर रहा आनन्दउर्मिला   मुरली   तेरा    मुरलीधर।।60।।