04 January 2009

बावरिया बरसाने वाली 17

था कहा "पिंजरित कीर मूक है हरित पंख में चंचु छिपा।
विधु-नलिन-नेत्र-मुद्रित-रजनी-मुख रहा चूम तम केश हटा।
क्या तुमने भ्रम से शशि को ही रवि समझा तम-मृग-आखेटी।
वह नभ-सरिता में नहा रही है चंद्रज्योति-पंखिनी बेटी ।
देखो तो तेरी गौर कांति से उसका गौरव गया छला ।
यह मुझे भुलावे में रखने की किससे सीखी काम-कला ?"
हा! प्रिय कुंकुम-मलिता दलिता बावरिया बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३६॥

तुमने ही तो था कहा प्राण! "सखि कितना कोमल तेरा तन ?
मोहक मृणाल-किसलय शिरीष-सुमनों का करता मद-मंथन।
बस सुमन-चयन-अभिलाषा से ही होती अमित अरुण अंगुली ।
हो जाते पदतल लाल लाल जब कभीं महावर बात चली।
थकती काया स्मृति से ही होगा सुरभित अंगराग-लेपन ।
कर गया ग्लानि-प्रस्वेद-ग्रथन कोमल मलमल का झीन वसन ।
हा! इस दुलार हित नित विकला बावरिया ने बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३७॥

9 comments:

  1. थकती काया स्मृति से ही होगा सुरभित अंगराग-लेपन ।
    कर गया ग्लानि-प्रस्वेद-ग्रथन कोमल मलमल का झीन वसन ।
    हा! इस दुलार हित नित विकला बावरिया ने बरसाने वाली-
    क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३७॥ .....बहुत सुन्दर. दिल को छूने वाली पंक्तियां !! कभी हमारे शब्द-सृजन (www.kkyadav.blogspot.com) पर भी आयें.

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  2. अतिसुन्दर प्रस्तुति, साधुवाद !! मेरे ''यदुकुल'' पर आपका स्वागत है....

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  3. बहुत सुंदर कविता.
    धन्यवाद

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  4. एक यही ब्लॉग है या रम्यन्तर की कुछ रचनाएं हैं जिन्हें बहुत धीरे-धीरे और रस ले-ले कर पढता हूँ.

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  5. Himanshunji pehele to shikayat ke aap bohot dinonse hamare blogpe nahee aaye...khair...ye mazaaq me kaha...mai aatee rehtee hun par is tarahkee rachnaonpe tippanee dene jaisee meree haisiyathi nahee....
    Bhashaki pracheentaa ise ek gambheer aur goodh swaroop detee hai, waheen vilakshan garimaa bhee pradan karti hai...

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  6. sunder bhavmay kavita ke liye bdhaai

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  7. वाह.... शानदार प्रस्तुति है भाई..

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  8. तत्‍सम युक्‍त शब्‍दावली में सुन्‍दर रचना, हार्दिक बधाई।

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