31 January 2009

बावरिया बरसाने वाली 20

कहते थे हे प्रिय! “स्खलित-अम्बरा मुग्ध-यौवना की जय हो ।
अँगूरी चिबुक प्रशस्त भाल दृग अरूणिम अधर हास्यमय हो ।
वह गीत व्यर्थ जिसमें बहती अप्सरालोक की बात न हो ।
परिरंभण-पाश-बॅंधी तरूणी का धूमिल मुख जलजात न हो।
कहता हो प्रचुर प्रेम-सन्देशा विद्युत विलसित जलद चपल।
उठता हो केलि-विलास-दीप्त उद्दाम कामना-कोलाहल।
क्या वीतराग हो गये विकल” बावरिया बरसाने वाली।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥52॥


सुधि करो प्राण! वह भी कैसी मनहरिणी निशा अनूठी थी।
सारी यामिनी विलग तुमसे प्रिय मान किये मैं रूठी थी।
गलदश्रु मनाते रहे चरण-छू छोड़ो सजनी नहीं-नहीं।
तेरा नखशिख श्रृँगार करूँ इस रजनी में कामना यही।
रक्ताभ रंग से रचूँ प्राण ! सित पद-नख में राकेश-कला।
आलता चरण की चूम बजे नूपुर-वीणा घुँघरू-तबला।
दुलराने वाले ! आ विकला बावरिया बरसाने वाली।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥53॥

“पिंडलि पर आँकू”, कहा श्याम “लतिका दल में खद्योत लिये।
नव कदलि-खम्भ मृदु पीन-जघन पर पुष्पराग दूँ पोत प्रिये!
विरॅंचू नितम्ब पर नवल नागरी व्रजवनिता बेचती दही।
पदपृष्ठप्रान्त में अलि-शुक-मैना मीन-कंज-ध्वज-शंख कही्।
फिर बार-बार बाँधू केहरि-कटि पर परिधान नवल धानी।
अन्तर्पट पर रच दूँ लिपटी केशव-कर में राधा रानी।”
हो चतुर चितेरे! कहाँ, विकल बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥54॥

था कहा ”पयोधर पर कर मेरे नील-झीन-कञ्चुकी धरें।
बाँधे श्लथ-बन्धन-ग्रंथि सुभग कुच अर्ध छिपे आधे उभरे।
रच दूँ पयोधरों के अन्तर में हरित-कमल-कोमल डंठल।
रक्ताभ चंचु में थाम उसे युग थिरकें बाल मराल धवल।
आवरण-विहीन उदर-त्रिबली में झलके भागीरथी बही।
हीरक-माला में गुँथी मूर्ति हो प्रथम-मिलन-निशि की दुलही।।“
ओ मनुहारक! आ जा विकला बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन-वन के वनमाली ॥55॥

28 January 2009

बावरिया बरसाने वाली १९

सुधि करो कहा था,"कभीं निभृत में सजनी! तेरा घूँघट-पट।
निज सिर पर सरका लूँ फ़िर चूमूँ नत-दृग अधर-सुधा लटपट।
छेड़ना करुण पद कुपित कोकिला रात-रात भर सो न सके ।
अलकों का गहन तिमिर बिखराना विरह-सवेरा हो न सके ।
रूठना पुनः अवगुण्ठन से मनुहार निहार उमड़ पड़ना ।
तुम इन्द्रधनुष-सी विनत, अधर झुक मेरे अधरों पर धरना।"
मनुहार-विशारद! आ, विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥48॥

प्रिय! झुका कदम्ब-विटप-शाखा तुम स्थित थे कालिन्दी-तट पर।
विह्वल सुनते थे लहरों का स्नेहिल कल-कल-कल छल-छल स्वर।
टप-टप झरते थे सलिल-बिन्दु थे सरसिज-नयन खुले आधा ।
भावाभिभोर हो विलख-विलख कह उठते थे राधा-राधा ।
थी मुदित प्रकृति, उत्सवरत थी नीचे वसुन्धरा,ऊपर नभ ।
खोये थे जाने कहाँ, पास ही थी मैं खड़ी प्राणवल्लभ !
उद्गार तुम्हारा सुन लिपटी बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥49॥

सुधि करो कहा था, "प्रेम-पर्व पर पंकिल उल्कापात न हो ।
जो प्रेयसि-परिरंभण-विहीन वह रात न हो, वह प्रात न हो ।
परिमल-प्रसून ले बहे पवन नित ज्योतित करे अवनि हिमकर।
लहरे पयोधि, प्रिय पिये सतत पियूष-प्रवाहित-प्रिया-अधर ।
नित धेनु-धूलि वेला में खेलें आँख मिचौनी दिन-रजनी ।
भ्रमरों के गुनगुन पर थिरके तितली प्रसून-संगिनी बनी ।"
उद्गारक! कहाँ छिपे विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥50॥

क्या नहीं कहा प्रिय! "मंजु-अँगुलियाँ खेलें प्रेयसि-अलकों में।
तारक-चुम्बित सित-तुहिन-बिन्दु झलकें वसुधा की पलकों में।
प्रातः समीर सुन्दरि-कपोल छू रोमांचित कर जाता हो ।
सागर निर्झरिणी को धरणी को इन्दु सप्रेम मनाता हो ।
सरसिज-संकुल-सर दिशा व्यर्थ जिसमें शुक-पिक-स्वर घात न हो।
देखूं न कभीं गिरि-शिखर जहाँ पर निर्झर-नीर-निपात न हो ?"
आ प्रेम-पुरोहित ढूँढ़ रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥51॥

22 January 2009

बावरिया बरसाने वाली 18

कहते थे प्राण "अरी, तन्वी! मैं कृष कटि पर हो रही विकल ।
कह रही करधनी ठुनक-ठुनक रो रहे समर्थन में पायल ।
भय है उरोज-परिवहन पवन से हो न क्षीण त्रिबली-भंजन ।
रोमांच पुलक-वलयिता कल्प-विटपिनी लता काया कंचन ।
जब किया अलक्तक-रस रंजित हो गये चरण बोझिल-विह्वल् ।
कुन्तल-सुगन्ध-भाराभिभूत किसलयी सेज से गयी बिछल ।"
प्रिय! इस स्नेहामृत की तृषिता बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥38॥

था कहा सुमन-मेखला-वहन से बढ़ती श्वांस समीर प्रबल ।
प्रश्वांस-सुरभि-पंकिल सरोज-मुख आ घेरते भ्रमर चंचल ।
प्राणेश्वरि सम्बोधन से ही खिल जाते गाल गुलाबी हैं ।
हो जाते तेरे नील जलद से तरलित दृग मायावी हैं ।
मधुकर-पक्षापघात-मारुत कर जाता भृकुटि-अधर-स्पंदन।
यह कह-कह रस बरसाने वाले छोड़ गये क्यों मनमोहन ।
कब विधु-मुख देखेगी विकला बावरिया बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥39॥

क्या कहूं आज ही विगत निशा के सपने में आये थे प्रिय !
तुम करते-करते सुरत प्रार्थना किंचित सकुचाये थे प्रिय !
मुझमें उड़ेल दी अपने चिर यौवन की अल्हड़ मादकता ।
दृग-तट पर दिया उतार हंस, थी पलकों पर गूंथी मुक्ता ।
अभिसार-सदन में दीपक की लौ उकसाया हौले-हौले ।
इतने भावाभिभूत थे प्रिय फ़िर अधर नहीं तेरे बोले ।
उस प्राणेश्वर को ढूंढ़ रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥40॥

निज इन्द्रनीलमणि-सा श्यामल कर में ले उत्तरीय-कोना ।
सहला मेरा शरदिन्दु भाल जाने क्या-क्या करते टोना ।
था गूंथ रहा नीलाम्बर में चन्द्रमा तारकों की माला ।
जाने क्या-क्या तुमने प्रियतम! मेरे कानों में कह डाला ।
आवरण-स्रस्त प्रज्ज्वलित अरुण किसलय समान कोमल काया।
मृदु पल्लव-दल-रमणीय-पाणि-तल से तुमने प्रिय! सहलाया।
जल-कढ़ी मीन-सी तड़प रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥41॥

अधरों पर चाहा हास किन्तु लोचन में उमड़ गया पानी ।
बहलाने लगी प्रेम की कह प्राचीन कहानी मृदुवाणी ।
इतने में ही वाटिका से कही प्रिय! विरही कोकिल कूका ।
मैं कह न सकूंगी क्यों निज आनन से मैनें दीपक फ़ूंका ।
लज्जित आनन पर अनायास ही श्यामकेशदल घिर आये।
तुम पीत पयोधर बीच विंहसते अपना आसन फ़ैलाये ।
प्रिय, अब भी वही तुम्हारी है , बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥42॥

सुधि करो प्राण! कहते गदगद "प्राणेश्वरि, तुम जीवनधन हो।
मुझ पंथ भ्रमित प्रणयी पंथी हित तुम चपला-भूषित घन हो।
तव अंचल की छाया में ही मेरी अभिलाषा सोती है ।
तव प्रणय-पयोधि-लहरियां ही मेरा मानस तट धोती हैं ।
तव मृदुल वक्ष पर ही मेरे लोचन का ढलता मोती है ।
तव कलित-कांति-कानन में ही मेरी चेतनता खोती है ।
अब सहा नहीं जाता विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥43॥

सुधि करो प्राण! कहते "मृदुले! तारुण्य न फ़िर फ़िर आता है।
वह धन्य सदा जो झूम झूम कर गीत प्रीति के गाता है ।
देखो, वसत के उषा-काल ने दिया शिशिर-परिधान हटा ।
मुकुलित रसाल टहनियाँ झूमतीं पुलक अंग में अंग सटा ।
देखो प्रेयसि! नभ के नीचे मारुत मकरंद लुटाता है ।
उन्मत्त नृत्य करता निर्झर गिरि-शिखरों से कह जाता है ।
चिर-तरुण, दर्शनोत्सुका विकल बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥44॥

था कहा "प्रिये! लहरते सुमन ज्यों फ़ेनिल-सरिता बरसाती ।
आनन्द-गीत गा रहा भ्रमर कुहुँकती कोकिला मदमाती ।
मेरे जीवन की चिर-संगिनि परिणय-पयोधि उफ़नाता है ।
आकाश उढ़ौना सुमन बिछौना तृण-दल पद सहलाता है ।
आओ हम अपने प्राणों को खग के कलरव में लहरा दें ।
द्रुत पियें अमर आसव वासंती मार पताका फ़हरा दें ।
तारुण्य-तरल ! है परम विकल बावरिया बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥45॥


था कहा विहँस "मृगनयनी! मेरा कर हथेलियों में ले लो ।
मृगमद से सुरभित करो पयोधर सरसिज कलिका से खेलो।
आओ रसाल-तरु के नीचे आदान-प्रदान करें चुम्बन ।
नीरव-निशीथ के परिरंभण में सुनें हृदय का मृदु-स्पंदन ।
गाओ गीतों के बिना निशा का स्वागत कब हो पाता है ।
आ लिपट जुड़ा लें तप्त प्राण यह वासर ढलता जाता है" ।
हो रसिक शिरोमणि! कहाँ विकल बावरिया बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥46॥

सुधि करो प्राण! कहते थे तुम,"बस प्राणप्रिये! इतना करना।
तेरी स्मृति में विस्मृत जाये संसृति का जीना-मरना ।
तेरी पीताभ कुसुम-काया मेरे कर-बंधन में झूले ।
तव मलय-पवन-प्रेरित दुकूल लहरा मेरा आनन छू ले ।
गूँथना चिकुर में निशिगंधा की नित तटकी अधखिली कली।
तेरी पायल की छूम्-छननन् ध्वनि ढोती फ़िरे हवा पगली ।"
खोजती निवेदक को विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥47॥

04 January 2009

बावरिया बरसाने वाली 17

था कहा "पिंजरित कीर मूक है हरित पंख में चंचु छिपा।
विधु-नलिन-नेत्र-मुद्रित-रजनी-मुख रहा चूम तम केश हटा।
क्या तुमने भ्रम से शशि को ही रवि समझा तम-मृग-आखेटी।
वह नभ-सरिता में नहा रही है चंद्रज्योति-पंखिनी बेटी ।
देखो तो तेरी गौर कांति से उसका गौरव गया छला ।
यह मुझे भुलावे में रखने की किससे सीखी काम-कला ?"
हा! प्रिय कुंकुम-मलिता दलिता बावरिया बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३६॥

तुमने ही तो था कहा प्राण! "सखि कितना कोमल तेरा तन ?
मोहक मृणाल-किसलय शिरीष-सुमनों का करता मद-मंथन।
बस सुमन-चयन-अभिलाषा से ही होती अमित अरुण अंगुली ।
हो जाते पदतल लाल लाल जब कभीं महावर बात चली।
थकती काया स्मृति से ही होगा सुरभित अंगराग-लेपन ।
कर गया ग्लानि-प्रस्वेद-ग्रथन कोमल मलमल का झीन वसन ।
हा! इस दुलार हित नित विकला बावरिया ने बरसाने वाली-
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥३७॥