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Archive: January 2009

बावरिया बरसाने वाली 20

कहते थे हे प्रिय! “स्खलित-अम्बरा मुग्ध-यौवना की जय हो । अँगूरी चिबुक प्रशस्त भाल दृग अरूणिम अधर हास्यमय हो । वह गीत व्यर्थ जिसमें बहती अप्सर...

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बावरिया बरसाने वाली 17

था कहा "पिंजरित कीर मूक है हरित पंख में चंचु छिपा। विधु-नलिन-नेत्र-मुद्रित-रजनी-मुख रहा चूम तम केश हटा। क्या तुमने भ्रम से शशि को ही रव...

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