29 November 2008

बावरिया बरसाने वाली १४

कैसे कहकर थे फूट पड़े छोडो अकेला मुझे प्रिये
इस प्रेम भिक्षु को ठुकरा कर मत दूर करो प्रस्थान प्रिये
नव-नव भंगिनी प्रणय-मुद्राओं से करो सूनी रजनी
थिरकते गीत की विविध राग-रागिनी रचोगी कब सजनी।
दर्पण में बिंबित विविध रमन-मुद्राएँ घटित करो रानी
पद-पूर्ति समस्यायें बूझेगा कौन पहेली की वाणी?
जा लीला-सर्जक ! विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥ ३०॥
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सुधि करो प्राण कहते थे तुम क्यों बात-बात में हंसती हो
किस कलुषित कंचन को मेरे निज हास्य-निकष पर कसती हो
तुम होड़ लगा प्रिया उपवन की सुरभित कलियाँ चुन लेते थे
सखियों से होती मदन-रहस-बातें चुपके सुन लेते थे
सहलाते थे मृदु करतल से रख उर पर मेरे मृदुल चरण
प्रिय-पाणि-पार्श्व से झुका स्कंध रख देते आनन पर आनन
धंस डूब मरे हा ! जाय कहाँ बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥ ३१॥

5 comments:

  1. बहुर्त ही सुंदर भाव.
    धन्यवाद

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  2. Bahut gahrai hai bhavon me...
    Badhai

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  3. aapki hindi ko salaam
    bade vakt ke baad is tarh ki bhasha padhi hai ki man me kautuk karne ki ichchaa apne aap ho aai
    likhte rahen
    http://birdswatchinggroupratla..blogspot.com par bhi log on kare

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  4. बहुत ही बढ़िया लिखा आपने1 बधाई1

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  5. कंचन जी के ब्लॉग पर निः शक्तों से जुड़े आपके अच्छे विचार बहुत अच्छे लगे।

    शेष शुभ

    इति शुभदा

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