17 November 2008

बावरिया बरसाने वाली १२

अगणित मधु प्रणय-केलि-क्षणिकाएं मानस पट पर लहरातीं ।
सुधि आती प्रिय क्या रही दशा जब तुमने भेजा था पाती ।
कम्पित अँगुली दृग पट बोझिल पुलकित वपु दक्षिण नयन-स्फुरण ।
उच्छ्वास उष्ण दोलित दुकूल अति अरुणिम अधर जघन कम्पन ।
उर्जस्वित अंगड़ाईयाँ अमित ज्यों फेनिल सरिता बरसाती ।
निस्पंद कीर पिंजर-पालित निष्कंप दीप लौ मुस्काती ।
वह पाती छाती दबा विकल बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥२६॥
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तेरे लालित विहंग मुझको दुलरा करते पवानारोहण ।
उमड़ता रभस रस-मिलन-घात का दर्दीला निशि-सम्मोहन ।
प्रति उषा-निशा में कुछ कपोल पर छलकी अश्रु-सलिल गगरी।
अभिसार-शून्य प्राणेश्वर-विरहित अंत विहीना विभावरी ।
गलबहियों के आकुल आमंत्रण में नागिन सी डंस जाती।
कुहरिल प्रदोष की विजन तारिका झिलमिल मिलन-गीत गाती।
निर्मोही! अब भी आ विकला बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली॥ २७॥

3 comments:

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