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बावरिया बरसाने वाली 9

सुधि करो कहा "क्यों स्नेह-सलिल संकुल तेरे कुवलय लोचन ।
क्यों गाढ़ प्रणय-परिरम्भण में होता वपु-प्रसरण-संकोचन ।
कोमल कुंतल के असित अंक में गूंथे तुमने विविध सुमन ।
उमड़ता रहा रसमय परिरम्भित उरज-संपुटित हृद-स्पंदन। "
जुड़ गए परस्पर अनायास हे प्रियतम ! अरुण अधर पल्लव।
प्राणेश हुए मेरे तन के रोमांचित सिंदूरी अवयव ।
उस क्षण की भिखमंगिनी बनी बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥१८॥
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पूछा "क्यों उर्मिल उदधि चंद्रकर झूम झूम चूमता सदा ?
निज अंतरालगत सलिल सम्पदा दिनमणि को बांटता मुदा ?
किस विकल वेदना में चकोर चुगता पावक का अंगारा ?
क्यों सोम-सूर्य करते फेरी अपलक निहारता ध्रुव तारा ?
क्यों नीरव नभ से निशा सुन्दरी धर्काती दृग मोती है ?
किस सुख में 'पंकिल' धरा ह्रदय संपुटित संपदा खोती है ?"
रो रही निरुत्तर वही व्यथित बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥१९॥
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