12 October 2008

बावरिया बरसाने वाली

व्रजमंडल नभ में उमड़-घुमड़ घिर आए आषाढ़ी बादल ।
उग गया पुरंदर धनुष ध्वनित उड़ चले विहंगम दल के दल ।
उन्मत्त मयूरी उठी थिरक श्यामली निरख नीरद माला ।
कर पर कपोल रखा निभृत कुञ्ज में अश्रु बहाती ब्रजबाला ।
मृदु कीर गर्भ पांडुर कपोल पर बिखर गयी कज्जल रेखा ।
विरहिणी राधिका उठी चीख जब जलद कृष्णवर्णी देखा ।
घनश्याम पधारो बिलख रही बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥

8 comments:

  1. आपका स्वागत है.

    ReplyDelete
  2. अति सुंदर रचना भानकर रचना उम्दा शब्दों से सजी रचना भावः पूर्ण रचना मज़ा आ गया स्वागत है मेरे ब्लॉग पर पधारने का आमंत्रण है

    ReplyDelete
  3. Aap ka swagat hai tatha aapke pitashri ki rachanao ko sab tak pahuchane ka aap ka bhaav abhinandniy hai | Mere blog par padharne ke saharsh aamantran ke saath......http://gaurishevatekar.blogspot.com,
    http://shevatekar.blogspot.com

    ReplyDelete
  4. घनश्याम पधारो बिलख रही बावरिया बरसाने वाली ।
    क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥
    Achi lagi aapke Pitaji ki kavita. Swagat mere blog par bhi.

    ReplyDelete
  5. Pitajeeke kaamko aage lake aapne hame bohot achha mauqa diya hai. Shubhkamnaon sahit swagat hai...mere blogpe aakeke liye snehsahit aamantran..
    Kavita behad khoobsoorteese rachi gayi hai, isse adhik kehna soorajko raushni dikhane jaisa hoga...

    ReplyDelete
  6. Phir ekbaar wahee rachnaa padhee...phir kuchh naya dikha...harbaar kuchh naya ehsaas hota hai, har shabd maynose koot kootke bhara hai...
    " Kay paran nikalnepe aoge jeevanke vanmaalee..? Kaisee aart pukaar hai is birhankee??

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियां मेरा मार्गदर्शन व उत्साहवर्द्धन करेंगी. सजग टिप्पणियां सजग रचनाधर्मिता के लिये आवश्यक होती हैं.कृपया स्नेह बनाये रखें .