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बावरिया बरसाने वाली2

थे नाप रहे नभ ओर-छोर चढ़ धारधार पर धाराधर ।

दामिनी दमक जाती क्षण-क्षण श्यामलीघटाओं से सत्वर ।

कल-कल छल-छल जलरव मुखरित था यमुना-पुलिन मनोहारी ।

तन से अठखेली कर बरबस खींचता प्रभंजन था सारी ।

परिरंभण में बांधे विटपों को थीं वल्लरी बिना बाधा।

अंचल पसार कर लगी बिलखने आ जा राधा के कांधा।

व्रजचंद्र! पधारो बिलख रही बावरिया बरसाने वाली।

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥ २॥

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1 comment:

  1. Yebhee bohot achhee lagee...mugdh aur stabdh dono hun !
    Himanshuji aapki kisee blogpe tippanee padhee.."...Yuheen gungunaye ke"...ab shabd theekse yaad nahee aa rahe...par phirse padh loongee...par bohot achhe shabd lage...kitna achha likh lete hain!!

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