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बावरिया बरसाने वाली 8

सुधि करो प्राण पूछा तुमने " वह पीर प्रिये क्या होती है ।

जिसकी असीम वेदना विकल हो निशा निरंतर रोती है।

आया न अभी ऋतुराज तभीं होती उजाड़ क्यों वनस्थली।

क्यों नंदनवन का प्रिय-परिमल बांटता प्रभंजन गली-गली ?

स्वप्निल निशि में क्यों चीख-चीख उठती न कोकिला सोती है?

निष्कंप दीप लौ पर पतंग बालिका कलेवर धोती है।"

बस टुकटुक मुख देखती रही बावरिया बरसाने वाली

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली॥ १५॥

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सुधि करो प्राण थी अंकगता किसलय काया अधखुले नयन।

श्लथ श्वांस सुरभि संघात जन्य थे काँप-काँप जाते पृथु स्तन।

छू मद-घूर्णित मेरे कपोल सिहरती रही कुंदन बाली।

तुम मृदु करतल से सहलाते थे मेरी अलकें घुंघुराली।

"जग में सर्वोत्तम कौन प्रिया?" पूछा था तुमने वनमाली ।

तब बाहुलता में बाँध तुम्हें मैं विहंस उठी कह "पंचाली"।

फिर भाव विलीन हुई तुममें बावरिया बरसाने वाली।

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥ १६ ॥

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भूलते न क्षण प्रियतम इंगित से तुमने मुझे बुलाया था।

प्राणेश्वरि! मत छोड़ना मुझे यह कहकर बहुत रुलाया था।

सुधि करो प्राण! रस-रंजित निशि में अवगुंठन-पट खींचा था ।

मृदु मदिर अधर पर 'पंकिल'-उर का प्रणय-पयोधि उलीचा था।

पूछा " भाती न उषा, संध्या पर क्यों बलिहारी होती हो ?

नीरव निशीथ में मधु शैय्या पर श्रद्धा-सुमन संजोती हो ?"

क्या कहे विराट प्राण ! बौनी बावरिया बरसाने वाली-

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥ १७॥

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2 comments:

  1. बावरिया बरसाने वाली की आकुलता छू गई मन को । ये तो महा काव्य लगता है । १ नं. से शुरू किया है । और मन जैसे राधा राधा हो गया । आगे की कडियों की प्रतीक्षा रहेगी । Kindly remove word verification because it deters the readers.

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  2. वाह.....अद्भुत रचना है ये.लगता है जैसे कई कड़ियों में कई फूल गूंधकर प्रभु के लिए कोई सुन्दर माला बनाई गयी हो.इस महान रचना को हम तक पहुंचाने के लिए आपको अनेक धन्यवाद..!

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