15 October 2008

बावरिया बरसाने वाली4

सिक्ता कर रही सुरंग चूनरी ऋतु पावसी निगोड़ी थी
स्मृति कौंध गयी कैसे मोहन से मचती होड़ा-होड़ी थी
किस विधि भींगा था पाग उपरना हार गए थे बनवारी
सिर नवा खड़े थे हरी ताली दे दे हंसती थी व्रजनारी
थे नवल किशोर कुञ्ज में स्थित दे कोमल कर में करमाला
शत-शत लीला तरंग स्मृति में बह गयी विरहिणी व्रजबाला
"
रसिकेश्वर!बात निहार रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली


बोली "सुधि करो प्राण !कहते थे हमने देखा है सपना
वह मधुबेला भूलती नहीं भूलता अधरों का कंपना
देखा था अनाघ्रात कलिका सी किए जलज लोचन नीचे
थी खड़ी वल्लभा वदन इंदु पर नील झीन अंचल खींचे
मृदु दर्पणाभ कोमल कपोल की हुई असित अरुणाई थी
नव कुबलय-दल-पड़-नख से रचती भू पर निज परछाईं थी
सपने
में अपना किया वही बावरिया बरसाने वाली -
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली

कहते "तव अरुण राग पद से भू अम्बर छपना देखा था
झलकते
नलिन लोचन दल से दृग सलिल टपकना देखा था
निज भुज प्रलंब से मसृण कलेवर थाम अंक में खींचा था
मधु अधर-पुटों पर 'पंकिल' उर का प्रणय-पयोधि उलीचा था
था प्राण! दलित-द्युति किसलय-वपु निकलती उष्ण थी दीर्घ श्वांस
और-और खींचते गए प्राणेश्वर ! मुझको और पास
विस्मृत कैसे हो गयी हाय बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली

2 comments:

  1. Ek ek shabd mein saagar ki gaharaai hai... ek ek pankti mein utkanthha, pyaas aur tripti ki anubhooti hai!....

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  2. बहुत ही खूबसूरत रचना है बावरिया बरसाने वाली बहुत खूब।

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