14 October 2008

बावरिया बरसाने वाली3


पी कहाँ पी कहाँ रटे जा रहा था पपीहरा उत्पाती
घन गरज-गरज इंगित करते लाये मनमोहन पाती
मल्लिका
मंजू पर मचल रहे श्यामल मिलिंद मतवारे थे
नवकमल दण्ड मृदु दबा चंच में उड़े हंस सित प्यारे थे
थी बिछड़ गयी लावण्यमयी श्री राधा-माधव की जोरी
कर पल्लव जोड़ पुकार उठी वृषभान किशोरी अतिभोरी
"क्यों भूल गए प्राणेश! विकल बावरिया बरसाने वाली-
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली


भर रही अंग में थी अनंग-मद सिहर लहर पुरवईया की
लगता कदम्ब की डाल-डाल पर मुरली बजी कन्हैया की
घन की बूँदों ने भिंगो दिया कीर्तिदा कुमारी की काया
प्रिय संग घटी वृन्दावन की सुधियों का ज्वर उमड़ आया
केकी-नर्तन था इधर, उधर थिरकती जलद में थी चपला
नभ अवनि-बीच घी धूम रहे चुप कैसे, चीख उठी अबला
"
हो ललित त्रिभंग! कहाँ विकला बावरिया बरसाने वाली-
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली

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