25 October 2008

बावरिया बरसाने वाली 7

सुधि करो प्राण पूछा तुमने "क्यों मौन खड़ी ब्रजबाला हो?

स्मित मधुर हास्य की मृदुल रश्मि से करती व्योम उजाला हो ।

तुम वारी-वीचि की सरसिज कलिका सी लेती अँगडाई हो ।

हो मरालिनी मानस सर की ऋतुराज सदृश गदराई हो।

क्यों मौन आँसुओं की भाषा सी दिए अधर पर ताला हो?

प्रिय मदिर नयन बंधूकअधर की ढरकाती मधुशाला हो।"

बस अपलक तुम्हें रही तकती बावरिया बरसाने वाली

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥१२॥

कहते थे "मौन उषा गवाक्ष से प्राण! झांकता सविता हो।

परिरंभण-व्याकुल युगल बाहु की अथवा तन्मय कविता हो।

हो बिम्बाधर अरुणाभ पाणिपद नवल नीरधर अभिरामा ।

ओ नवल नील परिधान मंडिता सित दशना कुंतल श्यामा।

री नव अषाढ़ की सजल घटा सी श्यामल कुंतल बिखराये।

अति चपल करों से चंचल अंचल अम्बर उर पर सरकाए ।

अब पलक उठा पूछे किससे क्या बावरिया बरसाने वाली-

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥१३॥

21 October 2008

बावरिया बरसाने वाली6

था कहा "धूसरित ग्रीष्म गगन या सरस बरसता पावस हो।
चांदनी चैत की हो डहकी या हेमंतिनी अमावस हो ।
प्रति दिवस जलज जयमाल लिए मैं सुमुखि करूंगा अभिनन्दन।
दृग ओट न होना निःसृत होगा हा राधा-राधा क्रंदन ।
कल-कंज विलोचन मदिर अधर की प्राण लुटाना मधुशाला।
मेरे जीवन की श्वांस-श्वांस हो तुम्ही सहचरी ब्रजबाला।"
गोविन्द हुई विस्मृत कैसे बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली।।१०॥

तुम मसृण पाणि मम पड़ सहला सो गए प्राण ले मधु सपना।
जब कहा "विदा बेला प्रियतम कर लूँ सम श्लथ दुकूल अपना ।"
कुछ कर्ण-कुहर में कह विहँसे तुम विधु-किरणोपम तिलक दिए।
प्रिया परिरम्भण में उठे खनक छूम-छननन नूपुर दुभाषिये।
पूछ "सखियाँ पूछेंगी ही स्वामिनि कैसे बीती रजनी ?"
बोले "दर्पण में निज कपोल चूमना ललक शतधा सजनी ।"
है वही कृष्ण-वारुणी पिए बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली।।११

18 October 2008

बावरिया बरसाने वाली 5

था कहा "अधर-रस-सुधा पिला" तन्वंगी ने तब था पूछा ।

क्या नाथ प्रणय प्रांगण का कलरव फिर हो जाएगा छूछा ।

घट रिक्त त्याग कर क्या हम फिर ले लेंगे मग अपना-अपना ।

वह फूट-फूट बिलखने लगी छीनो निज नाम न प्रिय अपना ।

दे गयी निगोड़ी दगा नींद तब अरुणशिखा ध्वनी थी गूँजी ।

श्यामल ने कहा जगा ही क्यों रोती होगी मेरी पूंजी।"

रख झूल गयी ग्रीवा में कर बावरिया बरसाने वाली ।

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥ ८॥


सुधि करो कहा था तुमने ही "चाहता नहीं कुछ और प्रिये!

तुम रहो तुम्हारा बंधन हो जग को दुलारता इसीलिये।

नीलाभ गगन पीताभ सुमन विहँसती पूर्णिमा राका हो ।

पावस घन से अभिसार हेतु उड़ती नभ बीच बलाका हो।

तुम अंकमालिका बनी निहारो कुटिल अलक स्वच्छंद किए ।

हमको इतना ही वांछित है जो जैसे चाहे जिए-जिए ।"

है वही पसारे पलक खड़ी बावरिया बरसाने वाली।

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥९॥

15 October 2008

बावरिया बरसाने वाली4

सिक्ता कर रही सुरंग चूनरी ऋतु पावसी निगोड़ी थी
स्मृति कौंध गयी कैसे मोहन से मचती होड़ा-होड़ी थी
किस विधि भींगा था पाग उपरना हार गए थे बनवारी
सिर नवा खड़े थे हरी ताली दे दे हंसती थी व्रजनारी
थे नवल किशोर कुञ्ज में स्थित दे कोमल कर में करमाला
शत-शत लीला तरंग स्मृति में बह गयी विरहिणी व्रजबाला
"
रसिकेश्वर!बात निहार रही बावरिया बरसाने वाली -
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली


बोली "सुधि करो प्राण !कहते थे हमने देखा है सपना
वह मधुबेला भूलती नहीं भूलता अधरों का कंपना
देखा था अनाघ्रात कलिका सी किए जलज लोचन नीचे
थी खड़ी वल्लभा वदन इंदु पर नील झीन अंचल खींचे
मृदु दर्पणाभ कोमल कपोल की हुई असित अरुणाई थी
नव कुबलय-दल-पड़-नख से रचती भू पर निज परछाईं थी
सपने
में अपना किया वही बावरिया बरसाने वाली -
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली

कहते "तव अरुण राग पद से भू अम्बर छपना देखा था
झलकते
नलिन लोचन दल से दृग सलिल टपकना देखा था
निज भुज प्रलंब से मसृण कलेवर थाम अंक में खींचा था
मधु अधर-पुटों पर 'पंकिल' उर का प्रणय-पयोधि उलीचा था
था प्राण! दलित-द्युति किसलय-वपु निकलती उष्ण थी दीर्घ श्वांस
और-और खींचते गए प्राणेश्वर ! मुझको और पास
विस्मृत कैसे हो गयी हाय बावरिया बरसाने वाली -
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली

14 October 2008

बावरिया बरसाने वाली3


पी कहाँ पी कहाँ रटे जा रहा था पपीहरा उत्पाती
घन गरज-गरज इंगित करते लाये मनमोहन पाती
मल्लिका
मंजू पर मचल रहे श्यामल मिलिंद मतवारे थे
नवकमल दण्ड मृदु दबा चंच में उड़े हंस सित प्यारे थे
थी बिछड़ गयी लावण्यमयी श्री राधा-माधव की जोरी
कर पल्लव जोड़ पुकार उठी वृषभान किशोरी अतिभोरी
"क्यों भूल गए प्राणेश! विकल बावरिया बरसाने वाली-
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली


भर रही अंग में थी अनंग-मद सिहर लहर पुरवईया की
लगता कदम्ब की डाल-डाल पर मुरली बजी कन्हैया की
घन की बूँदों ने भिंगो दिया कीर्तिदा कुमारी की काया
प्रिय संग घटी वृन्दावन की सुधियों का ज्वर उमड़ आया
केकी-नर्तन था इधर, उधर थिरकती जलद में थी चपला
नभ अवनि-बीच घी धूम रहे चुप कैसे, चीख उठी अबला
"
हो ललित त्रिभंग! कहाँ विकला बावरिया बरसाने वाली-
क्या
प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली

13 October 2008

बावरिया बरसाने वाली2

थे नाप रहे नभ ओर-छोर चढ़ धारधार पर धाराधर ।

दामिनी दमक जाती क्षण-क्षण श्यामलीघटाओं से सत्वर ।

कल-कल छल-छल जलरव मुखरित था यमुना-पुलिन मनोहारी ।

तन से अठखेली कर बरबस खींचता प्रभंजन था सारी ।

परिरंभण में बांधे विटपों को थीं वल्लरी बिना बाधा।

अंचल पसार कर लगी बिलखने आ जा राधा के कांधा।

व्रजचंद्र! पधारो बिलख रही बावरिया बरसाने वाली।

क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवनवन के वनमाली ॥ २॥

12 October 2008

बावरिया बरसाने वाली

व्रजमंडल नभ में उमड़-घुमड़ घिर आए आषाढ़ी बादल ।
उग गया पुरंदर धनुष ध्वनित उड़ चले विहंगम दल के दल ।
उन्मत्त मयूरी उठी थिरक श्यामली निरख नीरद माला ।
कर पर कपोल रखा निभृत कुञ्ज में अश्रु बहाती ब्रजबाला ।
मृदु कीर गर्भ पांडुर कपोल पर बिखर गयी कज्जल रेखा ।
विरहिणी राधिका उठी चीख जब जलद कृष्णवर्णी देखा ।
घनश्याम पधारो बिलख रही बावरिया बरसाने वाली ।
क्या प्राण निकलने पर आओगे जीवन वन के वनमाली ॥

बैठो मेरे पास

साहित्य का एक बड़ा ही मर्मस्पर्शी और सर्वग्राही अर्थ है 'सहित होना', साथ होना - to be with. What to be with ?- to be with 'joy' - आनंद । आनंद के साथ रहना साहित्य का आलिंगित अर्थ है, अभिवांछित अर्थ है । बाकी सब साहित्य की इस सार्थक अर्थवत्ता के आनुषांगिक अर्थ हैं। इसीलिये साहित्य को मनीषियों ने 'ब्रह्मानन्दसहोदर' कहा है । पिताजी ने सदा साहित्य का यही आंचल पकड़ा है और इसे व्यवसाय और प्रदर्शन से अब तक दूर ही रखा है।
साहित्य के विविध आयामों में आप ने काव्य की धारा को आत्मसात किया है। संस्कृत के लक्षण ग्रंथों तथा हिन्दी के मध्य युगीन एवं विज्ञ अर्वाचीन कवियों ने भी राधा कृष्ण को उपजीव्य बना कर हृदयस्पर्शी रचनाओं से साहित्य की गोद भरी है । जानकी वल्लभ शास्त्री की राधा, धर्मवीर भारती की कनुप्रिया, हरिऔध का प्रियप्रवास, गुप्त जी की विरहिणी ब्रजांगना आदि रचनाएँ कभीं कल कवलित नहीं हो सकतीं । सत्य तो यह है कि पिताजी ने यह सर्वमान्य सत्य उद्घोषित किया है -
'सुन्दरता सरसता सभी की स्रोत मात्र गोविन्द प्रिया
टेर रहा वृन्दावनेश्वरी मुरली तेरा मुरलीधर ॥'
प्रोषितपतिका नायिका, विमुग्धा नायिका, अभिसारिका आदि के अनेकों अद्भुत मनमोहक बिम्ब साहित्य में समलंकृत हैं किंतु करुण रस का परिपाक स्मृतियों के झरोखे से जितना गोपीवल्लभ कृष्ण के लिए हुआ है उसका स्पर्श अन्य किसी रस में नहीं देखा गया है । क्या सूर की भ्रमरगीत की रचना का कोई सानी है?
सम्प्रति मैं पिताजी की एक लघुकाय कृति 'बावरिया बरसाने वाली ' के छंदों को क्रमशः अवगाहनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ । इसमें कालिदास के मेघदूत का विरही यक्ष स्पंदित दिखायी दे रहा है । अन्तर इतना ही है कि यक्ष ने मेघ से संदेशवाहक का कार्य लेकर अपनी स्मृतियों एवं निर्देशों का संप्रेषण किया, वहीं इस सरस करुण काव्य में स्मृतियों का संप्रेषण नहीं आलोड़न है । राधा श्रीकृष्ण के संग व्यतीत की हुई घडिओं का मानस पटल पर अनुरंजन करती हैं और उस स्मृति के झूले पर झूलती हुई उद्वेलित, आंदोलित,उद्भ्रांत,आकर्षित, पुलकित और परिव्यथित होती हैं। स्मृतियाँ कृष्ण को बुलाने के लिए हैं, कृष्ण को उलझाने के लिए नहीं। राधा की यह आत्मरति अपने आप में साहित्य की अमर धरोहर बनेगी, इस आशा के साथ मैंने अपने ब्लॉग में इस श्रृंखला को संयुक्त किया है । आगे इसी क्रम अन्यान्य रचनाएँ भी सुधी पाठकों के अनुशीलनार्थ, पिताजी की लेखनी से निःसृत कृतियों के समीक्षार्थ प्रेषित करता रहूँगा । संभवतः उनके साहित्यिक सांस्कृतिक ऋण का परिहार कर सकूं।